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स्मृति शेष : आवाज़ की चंचलता का मौन आलाप
वो आवाज़ जो कभी ‘दम मारो दम’ की धुंध में थिरकती थी, कभी ‘इन आंखों
वो आवाज़ जो कभी ‘दम मारो दम’ की धुंध में थिरकती थी, कभी ‘इन आंखों