
उदयपुर। राजस्थान की राजनीति में कांग्रेस इन दिनों नगर निकायों की सीमावृद्धि और वार्डों के परिसीमन को लेकर मुखर हो रही है। उदयपुर में कांग्रेस ने इसी मुद्दे को भुनाने के लिए रणनीतिक बैठक बुलाई, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या यह बैठक वास्तव में जनता के मुद्दों को उठाने के लिए थी, या फिर टिकट के दावेदारों की लंबी कतार में अपनी जगह पक्की करने की एक कोशिश थी?
उदयपुर नगर निगम में पिछले तीन दशकों से बीजेपी का कब्जा है, और कांग्रेस बार-बार यह सवाल उठाती रही है कि आखिर क्यों वह बोर्ड नहीं बना पाई? क्या कांग्रेस की रणनीति इतनी कमजोर रही या फिर जनता ने ही उसके प्रति भरोसा नहीं जताया? यह विडंबना ही है कि जहां कांग्रेस अपनी चुनावी संभावनाओं की बात करती है, वहीं वह अब तक निकाय चुनावों में बोर्ड बनाने के लिए कोई ठोस योजना लेकर नहीं आई।
गृहकर, यूडी टैक्स और जनता की नाराजगी
बीजेपी ने जब गृहकर न लगाने का वादा किया था, तब जनता ने उसे हाथों-हाथ लिया और यही कांग्रेस के लिए चुनौती बना रहा। अब जबकि निगम प्रशासन यूडी टैक्स की वसूली में आक्रामक हो गया है, कांग्रेस इसे बड़ा मुद्दा बनाकर अपने पक्ष में माहौल बना सकती है। लेकिन क्या पार्टी इसे वाकई जनता के हित में मुद्दा बनाने की भी कोशिश कर रही है या सिर्फ बैठकों में ही चर्चा कर अपनों के बीच ही राजनीति कर रही है।
‘राजनीतिक दुर्भावना’ बनाम ‘वास्तविक चुनौती’
बैठक में यह आरोप लगाया गया कि सरकार वार्ड परिसीमन को राजनीतिक दुर्भावना से कर रही है। यह सच है कि परिसीमन किसी भी दल के लिए एक बड़ा संवेदनशील मुद्दा होता है, लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य है कि जो भी सत्ता में होता है, तब उस पर इसी तरह के आरोप विपक्ष की ओर से लगते रहे थे।
सड़कों पर संघर्ष या चुनावी गणित?
बैठक में जोर देकर कहा गया कि कांग्रेस को सड़कों पर उतरना होगा और जनता के बीच जाना होगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि यह संघर्ष वास्तविक रूप से जनता के मुद्दों को उठाने का होगा या फिर केवल चुनावी समीकरण साधने का? कांग्रेस के लिए निकाय चुनाव इस बार ‘करो या मरो’ की स्थिति में हैं, क्योंकि यदि इस बार भी बोर्ड बनाने में नाकाम रही, तो स्थानीय स्तर पर उसकी पकड़ और कमजोर हो जाएगी। उन सभी कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतरना होगा जो एयरपोर्ट पर नेताओं के स्वागत में और स्वर्गीय नेताओं की पुण्यतिथि और जयंती मनाते आ रहे हैं।
अगली रणनीति क्या होगी?
कांग्रेस के लिए यह सही समय है कि वह सिर्फ विरोध की राजनीति न करे, बल्कि जनता के बीच जाकर यह भरोसा दिलाए कि वह उनके मुद्दों को लेकर संजीदा है। सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी और सरकार पर आरोप लगाने से बात नहीं बनेगी, बल्कि जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने की भी जरूरत है।
उदयपुर कांग्रेस के लिए यह एक ‘परीक्षा की घड़ी’ है। चुनावी गणित और वास्तविक संघर्ष में कितना अंतर है, यह समय बताएगा। लेकिन अगर कांग्रेस वास्तव में जनता के बीच मुद्दों को लेकर जाती है, तो निकाय चुनावों में उसे बढ़त मिल सकती है। वरना, अगले चुनाव में फिर वही होगा—बैठकों का दौर, आरोप-प्रत्यारोप और तीन दशकों की हार का एक और अध्याय।
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