
सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं होता—वह सामाजिक बदलाव का जरिया भी बन सकता है। कुछ फिल्में अपनी गूढ़ संवेदनाओं और विचारोत्तेजक कथानकों के ज़रिए ऐसे सवाल उठाती हैं, जो नीतियों, व्यवहारों और यहां तक कि शैक्षणिक व्यवस्थाओं में भी परिवर्तन ले आते हैं।
ऐसी ही एक फिल्म है ‘स्थानार्थी श्रीकुट्टन’। यह मलयालम भाषा में बनी एक लो-बजट फ़िल्म है जिसने केरल के स्कूलों में बच्चों के बैठने के पारंपरिक तरीके को चुनौती दी और उसे बदलकर रख दिया।
फिल्म की कहानी में छिपा सामाजिक संदेश
‘स्थानार्थी श्रीकुट्टन’ (अनुवाद: ‘स्थानांतरण छात्र श्रीकुट्टन’) एक छोटे से गांव के साधारण लड़के की कहानी है, जो एक सरकारी स्कूल में ट्रांसफर होकर आता है। फिल्म में श्रीकुट्टन पढ़ने में होशियार है लेकिन वह पैर में विकलांगता के कारण क्लास में सबसे पीछे बैठने को मजबूर होता है।
फिल्म में एक अहम दृश्य आता है जहां टीचर उसे आगे बैठाने से मना कर देती है, क्योंकि “बेंच पहले से तय हैं” और “किसी का रूटीन न बिगड़े”। लेकिन धीरे-धीरे, शिक्षक और बाकी छात्र यह समझते हैं कि बैठने की व्यवस्था ‘समानता’ के सिद्धांत पर होनी चाहिए न कि ‘परंपरा’ पर।
यह दृश्य स्कूलों की उस रूढ़ व्यवस्था को उजागर करता है जिसमें बच्चों को उनके मानसिक या शारीरिक स्तर को ध्यान में रखे बिना अनुशासन के नाम पर एक फिक्स्ड सिस्टम में ढालने की कोशिश की जाती है।
सामाजिक प्रतिक्रिया और नीतिगत बदलाव
फिल्म के रिलीज़ के कुछ ही हफ्तों में सोशल मीडिया और लोकल न्यूज़ चैनलों पर बहस शुरू हो गई : क्या बच्चों को उनकी ज़रूरतों के मुताबिक बैठने की आज़ादी होनी चाहिए? क्या क्लासरूम का डिजाइन लचीलापन (flexibility) नहीं दर्शाना चाहिए?
केरल सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया :
फिल्म के प्रभाव को देखते हुए केरल के शिक्षा मंत्रालय ने एक सर्कुलर जारी किया जिसमें स्कूलों से आग्रह किया गया कि वे : बैठने की व्यवस्था को रोटेशन पर आधारित बनाएं।
विशेष ज़रूरतों वाले छात्रों को प्राथमिकता से आगे बैठाने की अनुमति दें। बैठने के लिए बच्चों की पसंद, सीखने की शैली और उनके दृष्टिगत स्वास्थ्य को भी ध्यान में रखें।
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पंजाब की प्रतिक्रिया :
केवल केरल ही नहीं, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की कुछ सरकारी स्कूलों ने भी ‘स्थानार्थी श्रीकुट्टन’ के प्रभाव से प्रेरित होकर अपने स्कूलों में “flexi-seating policy” लागू की। पंजाब के शिक्षा विभाग ने भी एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत 20 सरकारी स्कूलों में लचीली बैठने की प्रणाली शुरू की है।
“सीखने की जगह” बनाम “अनुशासन का डिब्बा”
शिक्षाविद् और बाल मनोवैज्ञानिकों ने लंबे समय से कहा है कि क्लासरूम बच्चों की आज़ादी और सहजता को प्रतिबिंबित करने वाली होनी चाहिए। डॉ. श्यामला नायर, जो कि तिरुवनंतपुरम स्थित एक चाइल्ड एजुकेशन स्पेशलिस्ट हैं, कहती हैं:
“इस फिल्म ने एक बात बहुत प्रभावशाली ढंग से कही है—अगर कोई बच्चा सीखना चाहता है, तो हमें उसे सुविधा देने से रोकना नहीं चाहिए।”
फिल्म निर्माताओं का बयान: हमने सिर्फ़ एक सच्चाई दिखाई
फिल्म के निर्देशक विनोद कृष्णन का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी सरकारी नीति को बदलना नहीं था। “हमने सिर्फ़ एक ऐसी स्थिति पर फिल्म बनाई थी जो हमें व्यक्तिगत रूप से चुभती थी। हमें नहीं पता था कि इसका असर इतना व्यापक होगा।”
अभिनेता मिथुन मोहन, जिन्होंने श्रीकुट्टन की भूमिका निभाई, कहते हैं : “शूटिंग के समय मैं खुद भावुक हो गया था क्योंकि मैंने ऐसे कई छात्रों को देखा है जो सिर्फ़ एक सीट के कारण उपेक्षा के शिकार हो जाते हैं।”
क्लासरूम में दिखने लगे बदलाव
अब कई स्कूलों में यह आम होता जा रहा है कि : छात्र खुद तय कर सकें कि वे कहां बैठना चाहते हैं। उन्हें किसी एक बेंच पर मजबूर न किया जाए।
हर हफ्ते बैठने की जगह बदलने की प्रथा अपनाई जाए ताकि सबको बराबरी का अनुभव मिले। कुछ स्कूलों ने “U-shaped seating” या “learning circles” भी अपनाना शुरू कर दिया है, जो पारंपरिक पंक्तिबद्ध (row-wise) व्यवस्था से हटकर सामूहिक सहभागिता को बढ़ावा देते हैं।
अंत में : सिनेमा का मूक लेकिन गूंजता प्रभाव
‘स्थानार्थी श्रीकुट्टन’ कोई बड़ी स्टारकास्ट वाली फिल्म नहीं थी। ना ही इसका बजट या प्रचार अभूतपूर्व था। लेकिन इसने जो किया, वह बड़ी-बड़ी नीतियां भी नहीं कर पाईं।
फिल्म ने यह दिखाया कि बदलाव लाने के लिए कभी-कभी एक संवेदनशील कहानी ही काफी होती है। स्कूल, जहां बच्चों का भविष्य आकार लेता है, वहां व्यवस्था में मानवीय स्पर्श ज़रूरी है—और अगर वह एक फिल्म की बदौलत आ रहा है, तो इसे सिर्फ़ कला का कमाल नहीं, समाज की जीत भी कहा जाना चाहिए।
क्या अगला बदलाव आपकी क्लास में भी आएगा?
क्या हम सिर्फ़ पढ़ा रहे हैं, या सही मायनों में बच्चों को “सीखने की जगह” दे रहे हैं?
जवाब आपके पास है।
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