“संघ की शताब्दी पर मोहन भागवत: रिटायरमेंट से इस्लाम तक, क्या कहा संघ प्रमुख ने?”

 

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में 26 से 28 अगस्त 2025 तक आयोजित आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के शताब्दी वर्ष समारोह में संघ प्रमुख मोहन भागवत का भाषण केवल संगठनात्मक संदेश भर नहीं था, बल्कि उसमें आने वाले समय की राजनीतिक और सामाजिक दिशा के संकेत भी छिपे हुए थे।
रिटायरमेंट, इस्लाम, घुसपैठ, जनसंख्या, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और बीजेपी-आरएसएस के रिश्तों पर उनकी राय ने यह दिखा दिया कि संघ अब भी भारतीय समाज और राजनीति के विमर्श में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

भागवत का यह वक्तव्य कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह संघ की वैचारिक स्थिति, बीजेपी के साथ उसके तालमेल और भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों को लेकर एक स्पष्ट संकेत देता है।

रिटायरमेंट पर विचार : नेतृत्व की निरंतरता का संदेश

भागवत के भाषण का सबसे चर्चित हिस्सा रिटायरमेंट को लेकर था।
उनसे सवाल पूछा गया था कि क्या 75 साल की उम्र के बाद राजनीति से रिटायर हो जाना चाहिए?” इस पर उनका जवाब था:

“मैंने मोरोपंत जी के बयान का हवाला देते हुए यह बात कही थी। मैंने यह नहीं कहा कि मैं रिटायर हो जाऊँगा या किसी और को रिटायर हो जाना चाहिए। हम जीवन में किसी भी समय रिटायर होने को तैयार हैं, और संघ जब तक चाहेगा, तब तक हम काम करते रहेंगे।”

यह बयान दो बड़े संकेत देता है:

संघ और राजनीति का अंतर: भागवत ने साफ किया कि राजनीति में लागू नियम संघ में बाध्यकारी नहीं हैं।

नेतृत्व की निरंतरता: यह संकेत भी है कि संघ में नेतृत्व परिवर्तन केवल उम्र पर आधारित नहीं होता, बल्कि संगठन की आवश्यकता के अनुसार तय किया जाता है।

👉 इस दृष्टि से देखें तो यह बात बीजेपी की 75 वर्ष की आयु के बाद सक्रिय राजनीति से हटने की अनौपचारिक परंपरा से भिन्न है। संघ अपने नेतृत्व को केवल उम्र से नहीं, बल्कि संगठनात्मक जरूरत और सामूहिक सहमति से तय करता है।

बीजेपी और आरएसएस का रिश्ता: “मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं”

मोहन भागवत ने अपने भाषण में सबसे स्पष्ट संदेश बीजेपी और संघ के रिश्ते पर दिया।
उन्होंने कहा:

हर सरकार के साथ हमारा अच्छा समन्वय रहा है, कहीं कोई झगड़ा नहीं है।”

मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं।”

बीजेपी सरकार में सब कुछ संघ तय करता है, यह पूरी तरह गलत है। सरकार अपने फैसले खुद करती है, हम केवल सलाह दे सकते हैं।”

विश्लेषण

संगठनात्मक दूरी और नजदीकी दोनों: यह बयान बताता है कि संघ अपनी भूमिका को एक मार्गदर्शक और वैचारिक आधार देने वाले संगठन के रूप में देखता है, न कि प्रत्यक्ष सत्ता चलाने वाली ताकत के रूप में।

आलोचना को नकारने का प्रयास: विपक्ष और आलोचकों का आरोप रहा है कि बीजेपी सरकार की नीतियों के पीछे संघ का दबाव रहता है। भागवत का बयान इस आलोचना को कमजोर करने की कोशिश है।

दीर्घकालिक दृष्टिकोण: बीजेपी एक राजनीतिक पार्टी है, जबकि संघ खुद को राष्ट्र निर्माण की दीर्घकालिक परियोजना मानता है। यह अंतर बनाए रखना दोनों के लिए ज़रूरी है।

👉 भागवत का यह संदेश न केवल बीजेपी-आरएसएस रिश्तों को स्पष्ट करता है, बल्कि यह भी बताता है कि संघ राजनीतिक विवादों से ऊपर खुद को स्थापित करना चाहता है।

इस्लाम और घुसपैठ पर विचार : “हम सब एक हैं”

मोहन भागवत ने इस्लाम और मुसलमानों के मुद्दे पर दो स्तर पर अपनी बात रखी:

इस्लाम भारत का हिस्सा है : इस्लाम जब पहले दिन भारत में आया, तभी से यह यहां है और आगे भी रहेगा। यह कहना कि इस्लाम नहीं रहेगा, हिंदू सोच नहीं है। संघर्ष खत्म होगा जब दोनों ओर विश्वास बनेगा कि हम सब एक हैं।”

घुसपैठ का विरोध : सरकार प्रयास कर रही है। हमारे देश में मुसलमान नागरिक भी हैं, उन्हें रोजगार देना चाहिए। लेकिन जो बाहर से आए हैं, उनके देश की व्यवस्था उनकी जिम्मेदारी है। उन्हें क्यों रोजगार दें?”

विश्लेषण

यह बयान संघ के भीतर चल रहे वैचारिक संतुलन को दर्शाता है।

समावेश और स्वीकार्यता : भागवत का यह कहना कि इस्लाम भारत का स्थायी हिस्सा है, संघ की परंपरागत छवि को नरम करने का प्रयास है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और पहचान का प्रश्न : लेकिन उसी वक्त उन्होंने घुसपैठ रोकने पर जोर देकर यह साफ किया कि बाहरी प्रभाव और अवैध प्रवासन संघ के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं।

द्विपक्षीय संतुलन: एक ओर उन्होंने मुसलमानों के रोज़गार और नागरिक अधिकार की बात की, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीयता और सीमा सुरक्षा पर कठोर रुख अपनाया।

इस तरह भागवत का बयान यह संदेश देता है कि संघ मुसलमानों को भारत का नागरिक मानते हुए भी राष्ट्रीय हित बनाम बाहरी घुसपैठ” के मुद्दे पर सख्ती चाहता है।

त्योहार और मांसाहार पर संवेदनशीलता

त्योहारों और व्रत-उपवास के समय मांसाहार के सार्वजनिक प्रदर्शन पर भागवत ने कहा:

“दो-तीन दिन की बात है, ऐसे समय इन चीजों से परहेज़ रखना चाहिए। इससे भावनाएं आहत नहीं होंगी और कानून बनाने की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी।”

विश्लेषण

सांस्कृतिक संवेदनशीलता पर बल: यह बयान बताता है कि भागवत सामाजिक व्यवहार में संवाद और समझदारी को प्राथमिकता देते हैं, न कि कानूनी दखल को।

कानून से पहले संस्कृति: संघ की सोच यह रही है कि समाज की समस्याओं का समाधान कानून से पहले सामाजिक अनुशासन और पारस्परिक सम्मान में है।

धर्म और आस्था का संतुलन: वे यह स्पष्ट कर रहे हैं कि आस्था के मुद्दों पर टकराव से बचने के लिए दोनों समुदायों को संवेदनशील होना चाहिए।

जनसंख्या और “तीन बच्चे” का प्रस्ताव

भागवत ने कहा : “भारत के हर नागरिक के तीन बच्चे होने चाहिए। देश की पॉलिसी 2.1 बच्चे की सिफारिश करती है। संतान 0.1 तो हो नहीं सकती, इसलिए तीन बच्चों का होना संतुलन के लिए ज़रूरी है।”

विश्लेषण

जनसंख्या नियंत्रण बनाम जनसंख्या संतुलन: भागवत ने केवल जनसंख्या घटाने की बात नहीं की, बल्कि जनसंख्या संतुलन पर जोर दिया।

सामुदायिक चिंता: उन्होंने यह भी कहा कि हिंदुओं की जन्मदर पहले से ही कम है, और अब अन्य समुदायों की भी घट रही है। यह बयान जनसंख्या के सामुदायिक संतुलन की संघ की पारंपरिक चिंता को सामने लाता है।

नीति बनाम सामाजिक वास्तविकता: सरकार की सिफारिश दो बच्चों तक सीमित है, जबकि भागवत तीन बच्चों का सुझाव देते हैं। यह उनकी दीर्घकालिक सोच और जनसंख्या को “शक्ति” मानने वाले दृष्टिकोण को दर्शाता है।

संघ की स्वीकृति और आलोचना का सफर

भागवत ने अपने भाषण में 1948 के जयप्रकाश नारायण और इमरजेंसी का जिक्र किया, साथ ही एपीजे अब्दुल कलाम और प्रणब मुखर्जी जैसे नेताओं के संघ आयोजनों में शामिल होने की बात कही।

विश्लेषण

यह हिस्सा संघ की वैचारिक स्वीकृति और छवि सुधार की कोशिश है।

भागवत यह दिखाना चाहते हैं कि समय के साथ संघ के बारे में गलतफहमियां टूटी हैं और विभिन्न विचारधाराओं के लोग संघ के करीब आए हैं।

राजनीतिक-सामाजिक निहितार्थ

मोहन भागवत का पूरा भाषण केवल संघ कार्यकर्ताओं के लिए संदेश नहीं था, बल्कि इसमें कई राजनीतिक और सामाजिक संकेत छिपे हैं:

राजनीतिक स्तर पर: बीजेपी और संघ के रिश्तों को लेकर चल रही अटकलों को शांत करने की कोशिश।

सामाजिक स्तर पर: मुसलमानों को नागरिक अधिकार देने और घुसपैठ रोकने, दोनों के बीच संतुलन साधना।

सांस्कृतिक स्तर पर: त्योहार और मांसाहार जैसे मुद्दों पर कानून की बजाय संवेदनशीलता और संवाद को बढ़ावा देना।

जनसंख्या नीति पर: एक वैकल्पिक विमर्श खड़ा करना, जिसमें संख्या नहीं, बल्कि संतुलन को केंद्र में रखा गया है।

मोहन भागवत का यह भाषण दिखाता है कि आरएसएस अभी भी भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श और राजनीतिक बहस का ध्रुव केंद्र है। रिटायरमेंट पर उनका बयान संघ की नेतृत्व परंपरा का संकेत था, बीजेपी-आरएसएस रिश्तों पर उनके शब्द संगठनात्मक दूरी और नजदीकी दोनों का परिचायक रहे। इस्लाम और घुसपैठ पर विचार में समावेश और सख्ती दोनों थे, जबकि जनसंख्या और त्योहार संबंधी बातें संघ की सामाजिक सोच को स्पष्ट करती हैं।

संक्षेप में, यह भाषण केवल एक नेता का विचार नहीं था, बल्कि यह संघ की शताब्दी के बाद की वैचारिक दिशा और भारत की सामाजिक-राजनीतिक यात्रा का रोडमैप भी प्रतीत होता है।

 

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