शैलेंद्र : दर्द से जन्मा अमर गीत ‘जीना यहां, मरना यहां’

मुंबई। हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग के बेमिसाल गीतकार शैलेंद्र का जीवन संघर्षों और संवेदनाओं से भरा रहा। 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में जन्मे शैलेंद्र ने अपने सरल मगर असरदार शब्दों से फिल्मी दुनिया को ऐसे गीत दिए जो हर वर्ग के दिल को छू गए।
राज कपूर के साथ उनकी जोड़ी ने “आवारा हूं”, “मेरा जूता है जापानी”, और “दिल का हाल सुने दिलवाला” जैसे सदाबहार गीतों को जन्म दिया। आम आदमी की भावनाओं को गीतों में पिरोने वाले शैलेंद्र ने कविता को गीतों के रूप में ढालकर जीवन की सच्चाइयों को सहजता से प्रस्तुत किया।
लेकिन उनकी जिंदगी का एक बड़ा मोड़ 1966 में आया, जब उन्होंने निर्माता के तौर पर अपनी पहली और आखिरी फिल्म ‘तीसरी कसम’ बनाई। राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के बावजूद, यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही। इस नाकामी ने उन्हें आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया।
इसी दौर में उनके करीबी मित्र राज कपूर ने उन्हें अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए गीत लिखने को कहा। राज कपूर ने गीत की शुरुआत “जीना यहां, मरना यहां” की पंक्ति से की। थके-हारे और पीड़ा से भरे शैलेंद्र ने उसी भावनात्मक अवस्था में पूरा गीत लिख डाला।
जब राज कपूर ने गीत पढ़ा तो वे स्तब्ध रह गए। यह केवल गीत नहीं था, बल्कि एक टूटे हुए इंसान की आत्मा की पुकार थी। “कल खेल में हम हों न हों, गर्दिश में तारे रहेंगे सदा…” जैसी पंक्तियों में शैलेंद्र ने अपने संघर्ष और दर्द को कविता में ढाल दिया।
यह गीत आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक अमर अध्याय है, जिसमें कलाकार के जीवन का यथार्थ झलकता है—हंसते चेहरे के पीछे छुपा गहरा दर्द।

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