फिर किसी बड़े हादसे का इंतजार : उदयपुर जिले में जर्जर स्कूलों की मरम्मत का क्या हुआ?… 5415 कक्षा-कक्ष असुरक्षित…उम्मीद है कलेक्टर साहब इस पर संज्ञान जरूर लेंगे

अखबारों (राजस्थान पत्रिका) में प्रकाशन के बाद भी यही हालात

 

निर्माण स्वीकृति केवल 18 को—हजारों बच्चे टेंट, टीनशेड और निजी मकानों में पढ़ने को मजबूर

उदयपुर। झालावाड़ के पीपलोद विद्यालय में हुए हादसे के बाद प्रदेशभर में स्कूल भवनों की सुरक्षा को लेकर जो तकनीकी सर्वे शुरू हुआ था, उसने उदयपुर जिले की चिंताजनक तस्वीर भी उजागर कर दी है। अगस्त 2025 में जारी सर्वे रिपोर्ट के अनुसार जिले में 480 स्कूल पूरी तरह जर्जर पाए गए हैं। इन स्कूलों के बच्चों को तुरंत दूसरे भवनों में शिफ्ट कर वैकल्पिक इंतजाम किए गए, लेकिन इन भवनों का निर्माण कब शुरू होगा—इसका अब तक कोई स्पष्ट समय नहीं है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि 480 जर्जर स्कूलों में से अब तक केवल 18 स्कूलों के भवनों के लिए ही प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति जारी हुई है, जबकि बाकी के स्कूलों के प्रस्ताव फाइलों में अटके पड़े हैं।

2921 स्कूलों का सर्वे, 5415 कक्षा-कक्ष पूरी तरह असुरक्षित

शिक्षा विभाग ने जिले के कुल 2921 स्कूलों की तकनीकी जांच करवाई। इसमें सामने आया कि : 480 स्कूल पूरी तरह जर्जर, 5415 कक्षा-कक्ष पूरी तरह असुरक्षित, जिनमें बच्चों को बैठाना प्रतिबंधित, 8483 कक्षा-कक्ष आंशिक रूप से जर्जर, जिन्हें तत्काल मरम्मत और मजबूतीकरण की जरूरत है।

असुरक्षित घोषित कक्षाओं को बंद कर दिया गया है। कई स्कूलों के बड़े हिस्से को ढहाना पड़ा, जिससे पढ़ाई के लिए पर्याप्त जगह ही नहीं बची।

उदयपुर जिले के कई इलाकों में बदतर हालात—कोटड़ा सबसे प्रभावित

कोटड़ा, गोगुंदा, झाड़ोल, खेरवाड़ा और सलूम्बर ब्लॉकों में हालात सबसे ज्यादा गंभीर हैं। कोटड़ा ब्लॉक के ही 100 से अधिक स्कूलों में पढ़ाई की व्यवस्था उपयुक्त नहीं बताई जा रही। प्रावि सालाघाटी (कोटड़ा) में बच्चे अस्थायी टेंट में पढ़ रहे हैं।

राप्रावि डोपसा लराठी (खेरवाड़ा) में कक्षाएं केलूपोश मकानों (मिट्टी-पत्थर के अस्थायी घरों) में संचालित हो रही हैं।

शिक्षकों के अनुसार कई जगह हालात इतने खराब हैं कि बारिश या तेज हवा आने पर कक्षाएं रोकनी पड़ जाती हैं।

गुणवत्ता पर असर — “टेंट व टीनशेड में पढ़ाई कराना मजबूरी”

जिले के शिक्षकों और अभिभावकों ने बताया कि वैकल्पिक इंतजामों के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। टेंट और टीनशेड गर्मी में बेहद गर्म, सर्दी में ठंडे, बारिश आते ही पानी रिसने की समस्या

छोटे बच्चों को शोर और अस्थिर बैठने की वजह से पढ़ाई में दिक्कत

शिक्षकों का कहना है कि कई गांवों में निजी मकान किराए पर लेकर स्कूल चलाए जा रहे हैं, लेकिन इन स्थानों पर बच्चों के लिए न तो पर्याप्त रोशनी है न ही सुरक्षा।

विभाग सौंदर्याकरण में व्यस्त, भवन निर्माण पीछे

जिले में वर्तमान में ‘विद्यालय सौंदर्याकरण एवं कायाकल्प अभियान’ चलाया जा रहा है, जिसके तहत- स्कूलों में पेंटिंग, रंग-रोगन, स्लोगन लेखन, दीवार चित्रण जैसे कार्य करवाए जा रहे हैं।

लेकिन शिक्षकों और अभिभावकों का कहना है कि सौंदर्याकरण से पहले जर्जर भवनों का निर्माण अधिक जरूरी था, ताकि टेंट और अस्थायी व्यवस्थाओं की जगह बच्चों को स्थायी, सुरक्षित कक्षाएं मिलें।

केवल 18 स्कूलों को मिली स्वीकृति — निर्माण कब शुरू होगा?

जिले के अतिरिक्त जिला परियोजना अधिकारी (समन्वयक) ननिहाल सिंह ने मीडिया को दिए बयान में बताया कि “सभी 480 स्कूलों के निर्माण और मरम्मत के प्रस्ताव बनाकर भेज दिए गए हैं। सर्वे में शामिल 18 स्कूलों के निर्माण के लिए 89 करोड़ की प्रशासनिक स्वीकृति जारी हुई है। जल्द कार्य शुरू किया जाएगा।”

लेकिन शिक्षकों का कहना है कि सर्वे तो “तत्परता” से हो गया, अब उतनी ही तत्परता से निर्माण और मरम्मत कार्य शुरू होना चाहिए, ताकि हजारों बच्चों की मुश्किलें कम हों।

राजस्थान पंचायती राज एवं माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष शेरसिंह चौहान ने कहा-“इतने बड़े पैमाने पर स्कूल जर्जर पाए गए हैं। विभाग को तुरन्त नई बिल्डिंग के निर्माण और मरम्मत पर फोकस करना चाहिए।”

क्या इंतजाम किए विभाग ने?

जर्जर घोषित स्कूलों के लिए विभाग ने इन वैकल्पिक व्यवस्थाओं का सहारा लिया। बच्चों को नजदीकी दूसरे सुरक्षित स्कूलों में भेजा, पंचायत भवनों में कक्षाएं, सरकारी भवनों का उपयोग, कई जगह निजी मकानों में किराए पर कक्षाएं, सुदूर इलाकों में टेंट और टीनशेड ये व्यवस्थाएँ अस्थायी हैं, लेकिन महीनों से यही बच्चों की पढ़ाई का आधार बनी हुई हैं।

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