क्रिकेट ने बदली ज़िंदगियां : भारत की ब्लाइंड महिला वर्ल्ड चैंपियंस की संघर्ष–गाथा

“अच्छा हुआ कि मुझे दिखता नहीं,” गंगा एस. कदम कहती हैं।
“क्योंकि अगर दिखता, तो मैं भी 7–8 क्लास के बाद शादी कर लेती… वर्ल्ड कप नहीं खेल पाती।”

ये वही गंगा कदम हैं, जो विमेन्स ब्लाइंड टी-20 वर्ल्ड कप 2025 की विजेता भारतीय टीम की सदस्य रही हैं।
यह पहला ब्लाइंड महिला वर्ल्ड कप था—और भारत इसमें अजेय रहा।

23 नवंबर को कोलंबो में हुए फ़ाइनल में भारत ने नेपाल को सात विकेट से हराकर इतिहास रच दिया।
लेकिन इस जीत के पीछे छिपी हैं छोटे गांवों से आईं खिलाड़ियों की बड़ी कहानियाँ—संघर्ष, ताने, सीमाएँ और सपनों की जीत।


कैसे खेला जाता है ब्लाइंड क्रिकेट?

ब्लाइंड क्रिकेट की गेंद अलग होती है—प्लास्टिक की, जिसमें छोटी बेयरिंग होती है।
गेंद हिलती है तो आवाज़ करती है, और खिलाड़ी उसी आवाज़ से उसकी दिशा पहचानते हैं।

खिलाड़ियों को तीन कैटेगरी में बांटा जाता है—B1, B2, B3।
B1 कैटेगरी के हर रन को दोगुना माना जाता है।

स्टंप्स मेटल के होते हैं, ताकि टकराने पर आवाज़ आए और खिलाड़ियों को विकेट गिरने का पता चले।

टीम की मैनेजर शिखा शेट्टी कहती हैं—
“यह खेल पूरी तरह संवाद पर चलता है… हर गेंद पर ‘तैयार?’ और ‘प्ले!’ की आवाज़ गूंजती है।”


“मैंने अपने पापा–मम्मी को पहचान दी है”

फुला सोरेन की आवाज़ भर जाती है।
“लोग कहते थे—ये अंधी है, क्या करेगी? अब वही लोग कहते हैं—हम जहाँ नहीं जा सके, वहाँ तुम गईं।”

फुला हंसकर कहती हैं—
“पहले लोग मेरे पापा को नहीं जानते थे… अब कहते हैं—ये फुला के पापा हैं। मुझे गर्व होता है।”


“दिल्ली क्यों जा रही हो?” — सिमू दास की कहानी

सिमू दास बताती हैं—
“गांव में लोग कहते थे, लड़की होकर दिल्ली जा रही है? सुरक्षित नहीं है।”

लेकिन वह अडिग रहीं।
पहले नेशनल टीम… फिर इंटरनेशनल।
नेपाल के खिलाफ़ पहला मैच खेला।

“लोग कहते थे—हमने नेपाल नहीं देखा, और तुम खेलकर आ गई!”

अब हालात बदल गए हैं।
“पहले घर आती थी, कोई पूछता नहीं था… अब गांव वाले कहते हैं—आपकी बेटी आई है।”


गांव की जकड़न और सपनों की उड़ान

कप्तान दीपिका टीसी कहती हैं—
“यह हमारा पहला वर्ल्ड कप था… पहली कोशिश में चैंपियन बन गए। यह पल सेना को डेडिकेट करती हूं।”

टीम प्रधानमंत्री मोदी से मिलने भी गई।
दीपिका कहती हैं—
“उन्होंने हमसे ऐसे बात की जैसे पिता बात करते हैं।”

गंगा अपनी बात दोहराती हैं—
“अगर मुझे दिखता, तो शायद शादी ही हो जाती। blindness मेरे लिए वरदान बनी।”

सुषमा पटेल का दर्द भी वही है—
“हमारे गांव में 12–14 की उम्र में शादी कर देते हैं… लेकिन पापा की सोच अलग थी, तभी मैं आगे आई।”

फुला की बात कड़वी है लेकिन सच—
“अगर क्रिकेट न खेलती, तो शायद आज भी गांव में होती… शादी हो चुकी होती।”

और फिर वह मुस्कुराकर कहती हैं—
“आज मैं अच्छे कपड़े पहनती हूं। मोदी जी से मिली हूं। यह सब क्रिकेट की वजह से है।”


ज़रूरत है सपोर्ट की

खिलाड़ियों की सबसे बड़ी मांग—सुविधाएँ।
“ब्लाइंड क्रिकेट के लिए न स्टेडियम है, न पर्याप्त फंड,” शिखा शेट्टी बताती हैं।

सिमू कहती हैं—
“अच्छा ग्राउंड मिल जाए, फंड मिल जाए… तो हम और बेहतर करेंगे।”

दीपिका की अपील साफ़ है—
“जैसे नॉर्मल क्रिकेट को सपोर्ट मिलता है, वैसा ही ब्लाइंड क्रिकेट को भी मिले।”


संघर्ष से चैंपियन बनने की दास्तान

ये सिर्फ खिलाड़ियों की कहानी नहीं है।
ये उन लड़कियों की कहानी है, जिन्हें कहा गया—
“घर में रहो… क्या करोगी बाहर जाकर?”

लेकिन उन्होंने जवाब दिया—
“हम वर्ल्ड कप लाकर दिखाएँगी।”

और उन्होंने सच में कर दिखाया।

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