
इस्लामाबाद। पाकिस्तान की राजनीति और न्याय व्यवस्था एक बार फिर आमने-सामने खड़ी दिखाई दे रही है। तोशाखाना-2 मामले में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान और उनकी पत्नी बुशरा बीबी को 17-17 साल की सजा और 1.64 करोड़ पाकिस्तानी रुपये के जुर्माने ने देश के राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब इमरान खान पहले से ही जेल में हैं और पीटीआई लगातार इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार देती रही है।
अदियाला जेल में सुनाए गए इस फैसले में अदालत ने माना कि सऊदी क्राउन प्रिंस से मिले बुल्गारी आभूषण को नियमों के विपरीत बेहद कम कीमत पर खरीदा गया, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान हुआ। अदालत ने इमरान खान को लोक सेवक के रूप में भरोसे के दुरुपयोग का दोषी मानते हुए कठोर सजा सुनाई, हालांकि उम्र और बुशरा बीबी के महिला होने के आधार पर “नरमी” बरतने की बात भी कही गई।
दूसरी ओर, इमरान खान का बचाव पूरी तरह राजनीतिक और प्रक्रियात्मक तर्कों पर टिका रहा। उन्होंने दावा किया कि तोशाखाना नीति 2018 के तहत सभी औपचारिकताएं पूरी की गईं, मूल्यांकन हुआ और भुगतान राष्ट्रीय खजाने में जमा कराया गया। पीटीआई का तर्क है कि यह मामला कानूनी से अधिक राजनीतिक है, जिसका उद्देश्य इमरान खान को चुनावी और सार्वजनिक राजनीति से पूरी तरह बाहर रखना है।
इस फैसले का व्यापक असर पाकिस्तान की राजनीति पर पड़ता दिख रहा है। एक तरफ सरकार और संस्थान इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के रूप में पेश कर सकते हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और इमरान समर्थक इसे न्यायिक प्रक्रिया के राजनीतिक इस्तेमाल का उदाहरण बता रहे हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि तोशाखाना से जुड़े मामलों में पहले भी अलग-अलग राजनीतिक नेताओं पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इस स्तर की सख्त सजा दुर्लभ मानी जा रही है।
आने वाले दिनों में यह मामला कानूनी लड़ाई से आगे बढ़कर राजनीतिक संघर्ष का रूप ले सकता है, क्योंकि इमरान खान और बुशरा बीबी के वकीलों ने हाईकोर्ट जाने के संकेत दे दिए हैं। ऐसे में असली परीक्षा उच्च न्यायपालिका की होगी—क्या वह इस फैसले को बरकरार रखेगी या इसे राजनीति और न्याय के टकराव के संदर्भ में नए सिरे से देखेगी।
कुल मिलाकर, तोशाखाना-2 का फैसला केवल एक भ्रष्टाचार मामला नहीं, बल्कि पाकिस्तान में सत्ता, संस्थानों और लोकतांत्रिक राजनीति के बीच जारी संघर्ष का नया अध्याय बन गया है।
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