राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय का 40वां स्थापना दिवस पर बोले निंबाराम-युवाओं के स्वबोध व स्वावलंबन से ही बनेगा आत्मनिर्भर भारत

युवाओं को रोजगार लेने वाला नहीं, रोजगार देने वाला बनाना होगा – निंबाराम
उदयपुर। राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय का 40वां स्थापना दिवस सोमवार को एग्रीकल्चर महाविद्यालय के कृषि भवन में अत्यंत गरिमामय एवं हर्षोल्लासपूर्ण वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित भव्य समारोह के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रीय प्रचारक (राजस्थान) निंबाराम रहे, जबकि अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुल प्रमुख एवं कुलाधिपति भंवरलाल गुर्जर ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. कैलाश सोडाणी, सलाहकार – राज्यपाल (उच्च शिक्षा) उपस्थित रहे। स्वागत उद्बोधन कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने दिया।

स्वामी विवेकानंद ने भारत की वैश्विक छवि को सुदृढ़ किया – निंबाराम

मुख्य अतिथि निंबाराम ने अपने उद्बोधन में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद ने विश्व पटल पर भारत को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को दूर किया और भारतीय सनातन संस्कृति, जीवन मूल्यों एवं आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से भारत की वैश्विक छवि को सुदृढ़ किया।
उन्होंने कहा कि भारत सदैव विश्व कल्याण की भावना से चलता आया है। हमारे यहां पूजा के बाद भी “धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो और विश्व का कल्याण हो” की कामना की जाती है। यही भारत का मूल स्वभाव और सच्चा हिंदुत्व है।
निंबाराम ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने ‘दरिद्र नारायण की सेवा’ को ही ईश्वर सेवा बताया और यह स्पष्ट किया कि भारत की आत्मा धर्म और अध्यात्म में निहित है। आज उनके स्वप्न को पूर्ण करना हम सभी का कर्तव्य है।
समाज परिवर्तन से आएगा राष्ट्र परिवर्तन
निंबाराम ने कहा कि सत्ता के बल पर परिवर्तन नहीं आता, बल्कि समाज परिवर्तन से राष्ट्र परिवर्तन संभव होता है। सत्ता अनुकूल होनी चाहिए, बाधक नहीं। प्रत्येक व्यक्ति को समाज में अपनी भूमिका निभानी होगी, जिसकी शुरुआत स्वयं से और अपने परिवार से करनी होगी।
उन्होंने कहा कि 2027 में विकसित भारत के निर्माण में मेरी क्या भूमिका होगी, इस पर प्रत्येक नागरिक को गंभीरता से चिंतन करना चाहिए।
युवाओं को रोजगारदाता बनाना समय की मांग
निंबाराम ने कहा कि भारत युवाओं का देश है। स्वामी विवेकानंद के विचारों के अनुरूप युवाओं में स्वबोध और स्वावलंबन का भाव जागृत कर ही आत्मनिर्भर भारत का निर्माण संभव है। बेरोजगारी की समस्या के समाधान के लिए श्रम के प्रति श्रद्धा विकसित करनी होगी। युवाओं को रोजगार लेने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला बनाना होगा।
उन्होंने युवाओं से राष्ट्र प्रतीकों, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, महापुरुषों और संविधान के प्रति सम्मान बनाए रखने का आह्वान किया। साथ ही सामाजिक समरसता पर बल देते हुए छुआछूत जैसी कुरीतियों के उन्मूलन हेतु तथाकथित बड़ों को विनम्रता से आगे आने और पिछड़े वर्गों को आत्मग्लानि से मुक्त होकर समाज निर्माण में सहभागी बनने का संदेश दिया।

पंच परिवर्तन से सशक्त भारत – कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत

प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए एवं विषय प्रवर्तन पर अपने विचार रखते हुए कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने कहा कि स्थापना दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि राष्ट्र चिंतन, मूल्यों और राष्ट्रप्रेम पर मनन करने का महत्वपूर्ण अवसर है।
उन्होंने बताया कि संस्थापक जनुभाई ने 21 अगस्त 1937 को विद्यापीठ की नींव रखी और 50 वर्षों के सतत प्रयासों के बाद 12 जनवरी 1987 को यह विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ।
कुलपति ने कहा कि जनुभाई का उद्देश्य केवल साक्षरता नहीं, बल्कि संस्कारित शिक्षा देना था। उनका ध्येय वाक्य “सरस्वती देवयंतो हवन्तु” आज भी विद्यापीठ की आत्मा है।
उन्होंने ‘पंच परिवर्तन’—स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य बोध एवं पारिवारिक संस्कार—को राष्ट्र निर्माण का आधार बताया।

प्रगति और परिवर्तन का आधार शिक्षा – प्रो. कैलाश सोडाणी

विशिष्ट अतिथि प्रो. कैलाश सोडाणी ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षा ही प्रगति और परिवर्तन का मूल आधार है। स्वतंत्रता के समय देश में केवल 22 विश्वविद्यालय थे, जबकि आज उनकी संख्या 1150 से अधिक है।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास, चिंतन और स्वास्थ्य परंपराओं को आधुनिक व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के साथ संतुलित करते हुए युवाओं तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने राजस्थान विद्यापीठ की विकास यात्रा, परंपरा और नवाचार को अपनाने की प्रवृत्ति की सराहना की।

समर्पित कार्यकर्ताओं की बदौलत विद्यापीठ इस मुकाम पर – भंवरलाल गुर्जर

समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलाधिपति भंवरलाल गुर्जर ने कहा कि 1937 में जब पढ़ना-पढ़ाना अपराध माना जाता था, तब जनुभाई ने विपरीत परिस्थितियों में विद्यापीठ की स्थापना की।
उन्होंने बताया कि 1987 में पांच पाठ्यक्रमों से प्रारंभ हुए विश्वविद्यालय में आज 100 से अधिक यूजीसी मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम संचालित हो रहे हैं। यह उपलब्धि नेतृत्व के साथ-साथ समर्पित कार्यकर्ताओं के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।
अन्य वक्ता एवं उपस्थिति
समारोह में समाजसेवी हिम्मत सिंह झाला, पीठ स्थविर डॉ. कौशल नागदा, रजिस्ट्रार डॉ. तरुण श्रीमाली ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम में प्रो. सुमंत व्यास (कुलपति, बीकानेर वेटनरी विश्वविद्यालय), प्रो. शिव शर्मा (डीन, वेटनरी महाविद्यालय नवानिया), प्रताप गौरव केंद्र के निदेशक अनुराग सक्सेना, हरिशंकर, विष्णु मेनारिया, धनराज, परीक्षा नियंत्रक डॉ. पारस जैन, डॉ. युवराज सिंह राठौड़, डॉ. भवानीपाल सिंह राठौड़, प्रो. जी.एम. मेहता, प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. गजेन्द्र माथुर, प्रो. मंजू मंडोत, डॉ. शैलेन्द्र मेहता, डॉ. हेमेन्द्र चौधरी, डॉ. धर्मेन्द्र राजौरा, डॉ. हीना खान, डॉ. निरू राठौड़, डॉ. अमी राठौड़, डॉ. बलिदान जैन, डॉ. निवेदिता, डॉ. सुनिता मुर्डिया, डॉ. भूरालाल श्रीमाली सहित विश्वविद्यालय के डीन, डायरेक्टर, अकादमिक एवं गैर-अकादमिक कर्मचारी, विद्यार्थी तथा शहर के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत व संचालन
समारोह से पूर्व अतिथियों ने मां सरस्वती, भारत माता एवं स्वामी विवेकानंद के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। इसके पश्चात कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत के सानिध्य में श्रमजीवी महाविद्यालय एवं प्रतापनगर परिसर में स्थित संस्थापक जनुभाई की आदमकद प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर नमन किया गया।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. हरीश चैबीसा ने किया एवं आभार रजिस्ट्रार डॉ. तरुण श्रीमाली ने व्यक्त किया।

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