
आप पढ़ रहे हैं हबीब की रिपोर्ट, उदयपुर।
उदयपुर की फ़िज़ा में शुक्रवार की रात ख़ामोशी पसरी हुई थी। सहर होने वाली थी। सवीना के नेला तालाब के पास पुराने अहमदाबाद बाइपास पर चार दोस्त कार में सवार थे। दिल में बस एक ही ख़याल—थोड़ी सी चाय, थोड़ी सी गुफ़्तगू। कौन जानता था कि ये चाय ज़िंदगी की आख़िरी आरज़ू बन जाएगी।
कार में बैठे ये सब अठारह साल से कम उम्र के मासूम थे। वो उम्र, जब ख्वाब आंखों में सजते हैं, जब ज़िंदगी अभी सवालों से भरी होती है, जवाबों से नहीं। किसी का जन्मदिन अभी गुज़रा ही था, किसी के सपनों ने अभी उड़ान भरनी शुरू की थी। मगर क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
जैसे ही कार बाइपास पर पहुंची, सामने से आती गुजरात नंबर की गाड़ी से टक्कर हो गई। टक्कर इतनी भीषण थी कि लोहे के जिस्म चूर-चूर हो गए। शीशे बिखर गए, चीख़ें हवा में घुल गईं। कारों के गेट तोड़कर जब लाशें निकाली गईं, तब एहसास हुआ कि ये हादसा नहीं, क़यामत का एक छोटा सा मंज़र था।

मोहम्मद अयान—जिसका जन्मदिन अभी कुछ दिन पहले ही मनाया गया था—अब खामोश था। आदिल कुरैशी, गुलाम ख्वाजा… मासूम चेहरे, अधूरे अरमान और अचानक थम गई धड़कनें। मां-बाप की गोद सूनी हो गई, घरों में सन्नाटा उतर आया। जो बच्चे रात को हंसते हुए निकले थे, वो सुबह कफ़न में लौटे।
ये सिर्फ़ एक सड़क हादसा नहीं था, ये चार घरों के उजड़ जाने की दास्तान थी।
संदेश : सड़क सिर्फ़ रास्ता नहीं होती, यह ज़िम्मेदारी भी होती है। ज़रा सी लापरवाही, तेज़ रफ्तार और बेपरवाही, किसी मां की दुआ, किसी बाप की उम्मीद, और किसी बच्चे की पूरी ज़िंदगी छीन लेती है।
अपनी रफ्तार कम रखिए, सड़क पर सब्र रखिए, क्योंकि किसी के घर का चिराग़
आपकी एक गलती से हमेशा के लिए बुझ सकता है।
प्रशासन के नाम संदेश :-अब भी वक़्त है। पुराने अहमदाबाद बाइपास पर
रफ्तार पर लगाम लगाइए, स्पीड ब्रेकर, साइन बोर्ड और निगरानी बढ़ाइए।
क्योंकि क़ानून की थोड़ी सी सख़्ती, किसी मां की गोद उजड़ने से बचा सकती है,
किसी बाप की उम्मीद ज़िंदा रख सकती है, और किसी मासूम की ज़िंदगी
कब्र में उतरने से रोक सकती है। सड़कें सिर्फ़ आवाजाही के लिए नहीं होतीं,
ये अमानत होती हैं— और अमानत में ख़यानत कभी माफ़ नहीं होती।
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