
उदयपुर। झीलों की नगरी से खाकी को शर्मसार करने वाली जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे किसी रक्षक की नहीं बल्कि भक्षक की कहानी बयां करती हैं। अंबामाता थानाधिकारी (SHO) मुकेश सोनी का वीडियो यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या पुलिस की ट्रेनिंग में अब तमीज की जगह गालियों और सुरक्षा की जगह थप्पड़ों ने ले ली है?
वीडियो में साफ़ दिख रहा है कि पुलिसकर्मी किसी कैफे में ऐसे घुस रहे हैं जैसे किसी आतंकवादी ठिकाने पर धावा बोल रहे हों। हाथ जोड़ते युवक, रहम की गुहार लगाता अस्पताल का स्टाफ और अपनी रोटी की थैली दिखाकर बेगुनाही साबित करता आम नागरिक—पर पुलिस के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।
यहां कुछ तीखे सवाल हैं जो गृह मंत्रालय और पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं।
गाली-गलौज की ट्रेनिंग का सच : क्या पुलिस की ट्रेनिंग में गाली-गलौज करना सिखाया जाता है? यदि यह उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा है, तो सरकार को इसे सार्वजनिक करना चाहिए। जनता को पता होना चाहिए कि जब वे किसी पुलिस अफसर से मदद मांगेंगे या जब पुलिस उनके घर या दुकान में घुसेगी, तो उन्हें ‘सभ्य भाषा’ की जगह ‘भद्दी गालियां’ ही सुनने को मिलेंगी।
अपराधियों से दोस्ती, आम जन पर सख्ती : पुलिस का नारा है—”आम जन में विश्वास, अपराधियों में खौफ”। लेकिन उदयपुर की यह घटना इस नारे को पूरी तरह झुठलाती है। आज धरातल पर स्थिति यह है कि पुलिस अपराधियों के साथ चाय की चुस्कियां लेती है और आम नागरिक को देखते ही उनके हाथ थप्पड़ बरसाने के लिए उठ जाते हैं।
संवेदनशीलता के नाम पर बर्बरता क्यों? : थानाधिकारी का यह तर्क कि “इलाका संवेदनशील है”, किसी भी तरह से मारपीट को न्यायोचित नहीं ठहराता। यदि कैफे देर रात तक खुला था, तो पुलिस के पास चालान काटने, सील करने या कानूनी धारा के तहत मामला दर्ज करने का अधिकार था। लेकिन सरेआम मारपीट करना और गालियां देना किसी ‘सभ्य पुलिस’ की पहचान नहीं है।
“जब पुलिस कानून हाथ में लेने लगे, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? क्या गृह मंत्रालय यह सुनिश्चित करेगा कि वर्दी पहनने के बाद इंसान को इंसान समझा जाए?”
गृह मंत्रालय को हस्तक्षेप की जरूरत
यह केवल एक थाने की घटना नहीं है, बल्कि एक बीमार मानसिकता का उदाहरण है। गृह मंत्रालय को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि आखिर क्यों पुलिस इतनी निरंकुश होती जा रही है। अगर समय रहते इन पर लगाम नहीं कसी गई, तो जनता का कानून से विश्वास उठना तय है।
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