फोटो : कमल कुमावत

उदयपुर। अरे भई, सियासत का पर्दा जब उठता है ना, तो हर कोई हीरो बनने का सपना लेकर ही स्टेज पर कदम रखता है! नामांकन का आख़िरी दिन था और कलेक्ट्रेट की ज़मीन पर मानों मुकद्दर का सिकंदर बनने की होड़ मची हुई थी। बीजेपी के ज़्यादातर सूरमा अपने-अपने लश्कर, ढोल-नगाड़ों और समर्थकों के पूरे हुजूम के साथ मैदान-ए-जंग में कूद पड़े। कोई जत्थों में आ रहा था, तो कोई अकेले ही भारी-भरकम जुलूस लेकर यह जताने की फ़िराक में था कि ‘असली बाहुबली तो हम ही हैं!’
मगर जनाब, सियासत में जो आंखों से दिखता है, बात सिर्फ़ उतनी नहीं होती। असली बाज़ी तो वो होती है जो कैमरे के लेंस से पकड़ी जाती है। हमारे फ़ोटो जर्नलिस्ट और बीजेपी के ओबीसी नेता कमल कुमावत ने अपने कैमरे के लेंस से इन सियासी सूरमाओं के चेहरे ही नहीं, बल्कि उनके दिल के अंदर पल रहे अरमानों और अदाओं को भी हमेशा के लिए क़ैद कर लिया है।

अब ज़रा ग़ौर से देखिए इन तस्वीरों को… अगर आप सियासत की ज़बान और तस्वीरों की खामोशी को पढ़ना जानते हैं, तो खेल साफ़ समझ आ जाएगा! देखिए, किसका हाथ किसके कंधे पर कितनी मज़बूती से टिका है? कौन किससे कितनी शिद्दत और कितनी देर तक गले मिल रहा है? और वो जो दूर खड़ा होकर तिरछी मुस्कान फेंक रहा है, उसके दिमाग़ में कौन-सी चाल चल रही है?

अरे, किसी के चेहरे की चमक गवाही दे रही है कि वो खुद को आज ही से शहर का ‘मेयर’ मानकर कुर्सी की नाप ले चुका है, तो किसी की नज़रों में टिकट पाकर भी अगली जंग जीतने की फ़िक्र साफ़ छलक रही है। यह महज़ पर्चे भरने का मजमा नहीं, यह तो वो फ़िल्मी क्लाइमेक्स है जहां हर किरदार अपने डायलॉग से नहीं, बल्कि अपनी अदाओं से तकदीर का फ़ैसला लिख रहा है। अब देखना यह है कि जनता किस अदा पर ताली बजाती है और किसकी फ़िल्म को बॉक्स ऑफ़िस पर हिट करती है!
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