
आप पढ़ रहे हैं हबीब की रिपोर्ट

सिनेमा के सुनहरे दौर में जब रमेश सिप्पी की फिल्म ‘शोले’ में ठाकुर बलदेव सिंह के हाथ काट दिए गए थे, तो लगा था कि जुल्म ने इंसाफ की ताकत छीन ली। मगर ठाकुर ने कहा था कि हाथ कटे हैं, हौसले नहीं। शनिवार की सुबह जब दिल्ली की नींद खुली, तो देश के तख्त की चौखट पर भी कुछ ऐसा ही मंजर पसरा था। हुकूमत ने पहियों पर ताले जड़ दिए, पटरियों पर दौड़ती रफ्तार थाम ली और हवाओं में तैरते इंटरनेट के सिग्नलों का गला घोंट दिया, ताकि जंतर-मंतर की पथरीली जमीन पर कोई आवाज न गूंज सके। लेकिन हुक्मरान शायद भूल जाते हैं कि जब अवाम के सीने में आक्रोश की चिंगारी सुलगती है, तो रास्ते बंद करने से आग बुझा नहीं करती; वह और फैल जाती है।
लोगों ने जंतर-मंतर और इंडिया गेट के बीच उस वीराने को देखा है, जो किसी लोकतान्त्रिक मुल्क का दिल कम और किसी युद्धग्रस्त किलेबंदी की सरहद ज्यादा मालूम पड़ता है। चारों तरफ लोहे के बैरिकेड्स, कंटीले तार और खाकी वर्दी का एक ऐसा अजगर कुंडली मारे बैठा है कि परिंदा भी पर न मार सके। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और 12 करोड़ मतदाताओं के कथित मताधिकार छीने जाने के विरोध में जब कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और छात्र नौजवानों ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर दस्तक देने की ठानी, तो निज़ाम के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं।
हुकूमत की इस घबराहट का नजारा देखिए। नई दिल्ली और हज़रत निज़ामुद्दीन आने वाली 250 से ज्यादा मेल और एक्सप्रेस ट्रेनें रद्द कर दी गईं। दिल्ली मेट्रो के 45 से अधिक स्टेशनों पर सन्नाटा पसरा रहा। जो मेट्रो हर रोज लाखों सपनों, दफ्तर जाते बाबुओं, कॉलेज की दहलीज लांघते युवाओं को उनकी मंजिल तक पहुंचाती थी, उसके शटर गिरा दिए गए। इंडिया गेट के चारों तरफ चार किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट का ब्लैकआउट था। आरएएफ, बीएसएफ और पुलिस के करीब 38 हजार संगीनधारी जवानों ने जनपथ, संसद मार्ग, मंडी हाउस से लेकर नोएडा के चिल्ला बॉर्डर तक पहरा बिठा दिया।
जंतर-मंतर की ओर कदम बढ़ाने की कोशिश कर रहे युवाओं को खींच-खींचकर पुलिस वैनों में ठूंसा गया। मुंबई से दिल्ली पहुंचे सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके, सह-संस्थापक सौरव दास और प्रवक्ता आशुतोष रांका को कदम रखते ही हिरासत में ले लिया गया। लेकिन कमाल देखिए, जब पुलिस ने सफदरजंग फ्लाईओवर पर आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और दीपांकर भट्टाचार्य को रोका और मैदान गढ़ी के डिटेंशन सेंटर भेजा, तो नेहा बोरा ने खिड़की से मुस्कुराते हुए कहा—’हमें हिरासत में ले सकते हो, आंदोलन को नहीं। अगर आगे रास्ता बंद है, तो सड़क पर ही बैठ जाओ।’
उधर साउथ एवेन्यू में जब पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने साथियों के साथ धरने पर बैठीं, तो पुलिस उन्हें भी द्वारका नॉर्थ थाने उठा ले गई। देर शाम जब ममता रिहा हुईं, तो उनकी आंखों में वही पुराना सियासी तेवर था। उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन सबूतों के साथ राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के सामने खड़ा होगा।
परदे पर भले ही दिल्ली की घेराबंदी दिख रही थी, लेकिन कहानी सिर्फ राजधानी के चंद किलोमीटरों तक महदूद नहीं रही। जब दिल्ली में जंतर-मंतर की तरफ बढ़ती सड़कों को सील किया गया, तो देश के दूसरे छोर तक इसकी अनुगूंज सुनाई दी। बेंगलुरु की सड़कों से लेकर कोलकाता के चौराहों तक और पटना से लेकर चेन्नई के आइलैंड ग्राउंड्स तक, जहां राहुल गांधी छात्रों के बीच दहाड़ रहे थे—एक ही सवाल तैर रहा था कि क्या एक मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी आम नागरिक के वोट के अधिकार से ज्यादा बड़ी हो गई है? छात्र संगठन एसएफआई के महासचिव सृजन भट्टाचार्य ने सुरजीत भवन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिल्कुल सही कहा—’पुलिस हमें जहां भी बैरिकेड लगाकर रोकेगी, हमारे लिए वही जगह जंतर-मंतर बन जाएगी।’
शाम ढलते-ढलते जब हिरासत से छूटे सीजेपी नेता अजिंक्य शिंदे ने ऐलान किया कि ‘कल सुबह 10 बजे हम फिर जंतर-मंतर कूच करेंगे’, तो लगा कि यह कोई एक दिन का नाटक नहीं है। यह उस पीढ़ी का संघर्ष है जिसे अपने भविष्य की फिक्र है।
अदालत के मुख्य न्यायाधीश ने शुक्रवार को बिल्कुल ठीक याद दिलाया था कि ‘मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।’ मगर सत्ता के नशे में हथौड़ा और भारी कर दिया गया। इतिहास गवाह है कि जब-जब हुकूमतों ने संवाद की जगह दमन और पहरों का रास्ता चुना है, तब-तब सड़कों की खामोशी एक बड़े तूफान की पेशबंदी साबित हुई है। जंतर-मंतर की बत्ती भले ही बुझा दी गई हो, मगर मुल्क की रूह में जलती मशाल को बुझाना किसी भी पहरेदार के बस की बात नहीं है। रात दस बजे बाद मेट्रो के स्टेशन चालू कर दिए गए।
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