
उदयपुर। झीलों की नगरी उदयपुर में जब सावन की पहली फुहारें गिरती हैं और अरावली की पहाड़ियां हरी चुनरी ओढ़ लेती हैं, तब फतहसागर की पाल और सहेलियों की बाड़ी मार्ग पर साकार होता है—ऐतिहासिक हरियाली अमावस्या का मेला। यदि इस बार आप किसी कारणवश फतहसागर की पाल पर लगने वाले इस ऐतिहासिक मेले की रौनक देखने नहीं पहुँच पाए हैं, तो चिंता न करें। हमारे फोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत के कैमरे के लेंस से कैद तस्वीरों और इस विशेष ग्राउंड रिपोर्ट के ज़रिए महसूस कीजिए मेले का अनूठा उत्साह और सांस्कृतिक छटा।
इतिहास और परंपरा का मेल : 125 से अधिक वर्षों की अनूठी विरासत
महाराणा फतह सिंह द्वारा प्रारंभ किया गया यह मेला मेवाड़ की उस लोक-संस्कृति का प्रतीक है, जहाँ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और मानवीय आनंद एक साथ थिरकते हैं। फतहसागर की विशाल झील में हिलकोरे मारता पानी, छलकती चादर और उसके किनारे लगा रंग-बिरंगा मेला—हर दृश्य में एक कहानी छुपाए हुए है।
मेले की सबसे अनूठी बात इसकी दो दिवसीय व्यवस्था है। प्रथम दिन जहाँ बच्चे, बुजुर्ग, युवा और पूरा परिवार एक साथ मेले का आनंद उठाता है; वहीं मेले का दूसरा दिन पूरी तरह से ‘सहेलियों’ यानी केवल महिलाओं के लिए आरक्षित रहता है। दशकों पुरानी यह व्यवस्था आज भी पूरी आत्मीयता से निभाई जा रही है।
कैमरे से झलकीं मनमोहक तस्वीरें
कैमरों के थ्रू खींची गई हर तस्वीर में मेले की धड़कन स्पष्ट महसूस की जा सकती है:
खिलखिलाती फतहसागर की पाल : अरावली की धुंधली पहाड़ियों की पृष्ठभूमि में फतहसागर की लहरों के संग हिंडोले और चकरी (झूलों) का विहंगम दृश्य।
पारंपरिक वेशभूषा और उल्लास : राजस्थानी चुनरी, बंधेज और लहरिया परिधानों में सजी महिलाएँ, जिनके हाथों में रची मेहंदी और होंठों पर लोकगीत मेले को जीवंत बना रहे हैं।
हाट-बाजार का रंगीन संसार : मिट्टी के बने खिलौने, लाख की चूड़ियाँ, पारंपरिक आभूषण और लोक-शिल्प की दुकानों पर उमड़ी भीड़।
स्वाद का अनूठा संगम : मालपुआ-रबड़ी, करारे भुट्टे, खट्टी-मीठी चाट और गरमा-गरम पकौड़ों का आनंद लेते लोग, जिनकी हर एक झलक तस्वीर में चटकारे भरती नजर आती है।
संस्कृति और प्रकृति का संदेश : हरियाली अमावस्या का मेला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति पूजा का सबसे बड़ा सांस्कृतिक पर्व है। फतहसागर के पानी पर पड़ती सूरज की किरणें और ढोल की थाप पर थिरकते युवा—कमल कुमावत की फोटोग्राफी ने इस क्षण को हमेशा के लिए अमर कर दिया है।
यदि आप इस बार फतहसागर की पाल पर नहीं जा पाए, तो इन तस्वीरों को देखकर अगली बार अपनी उपस्थिति का संकल्प ज़रूर बना लेंगे!
















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