‘शोध और भारत का पुनरुत्थान’ पर मंथन: भारतीय दृष्टिकोण से शोध की नई दिशा तय करने का आह्वान

उदयपुर। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में बुधवार को स्नातकोत्तर अध्ययन अधिष्ठाता कार्यालय की ओर से

उदयपुर। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में बुधवार को स्नातकोत्तर अध्ययन अधिष्ठाता कार्यालय की ओर से ‘शोध और भारत का पुनरुत्थान’ विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। बप्पा रावल सेमिनार हॉल (गेस्ट हाउस) में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय सह-संयोजक चंद्रकांत जी ने कहा कि भारत के पुनरुत्थान के लिए शोध को भारतीय दृष्टिकोण, भारतीय ज्ञान परंपरा और समकालीन चुनौतियों के अनुरूप नई दिशा देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. कैलाश डागा ने की, जबकि स्वागत उद्बोधन स्नातकोत्तर अध्ययन अधिष्ठाता प्रो. के. बी. जोशी ने दिया। उन्होंने कहा कि शोध केवल अकादमिक औपचारिकता न होकर समाज और राष्ट्र की वर्तमान समस्याओं के समाधान का माध्यम बनना चाहिए। उन्होंने शोधार्थियों से नवाचार आधारित एवं समाधानोन्मुख विषयों पर कार्य करने का आह्वान किया।

अपने व्याख्यान में चंद्रकांत जी ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था, शोध की दिशा और औपनिवेशिक मानसिकता के प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मैकॉले की शिक्षा प्रणाली ने भारतीयों की सोच और शोध दृष्टि को प्रभावित किया तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति अनेक भ्रांतियां फैलायी गईं। उन्होंने संस्कृत अध्ययन के लिए ब्रिटेन में स्थापित बोडेन चेयर और आर्य आक्रमण सिद्धांत का उल्लेख करते हुए इतिहास और शोध को भारतीय दृष्टि से पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता बताई।

उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक मानसिकता केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि भाषा और विचारों में भी दिखाई देती है। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि ‘ब्लैक’ एक रंग है, लेकिन ‘ब्लैकमेलिंग’, ‘ब्लैक मार्केटिंग’ और ‘ब्लैक लिस्टिंग’ जैसे शब्दों ने इसे नकारात्मक अर्थों से जोड़ दिया। ऐसे उदाहरणों को व्यापक सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में समझने की जरूरत है।

धर्म और रिलिजन के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में धर्म किसी संप्रदाय का नाम नहीं, बल्कि जीवन का नैतिक आधार और कर्तव्यबोध है। धर्मचक्र, धर्मशाला, धर्मकांटा, धर्मभाई और धर्मबहन जैसे उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति में धर्म की व्यापक अवधारणा को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा कि भारत ने लगभग एक हजार वर्षों तक अनेक आक्रमणों और चुनौतियों का सामना किया है। ऐसे में भारतीय समाज में आत्मविश्वास का पुनर्निर्माण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अतीत की उपलब्धियों पर गर्व करना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे आगे बढ़कर वर्तमान समस्याओं के समाधान हेतु भारतीय ज्ञान परंपरा से प्रेरित शोध को बढ़ावा देना होगा।

चंद्रकांत जी ने भारतीय और पश्चिमी सामाजिक संरचना की तुलना करते हुए कहा कि भारतीय समाज में परिवार सबसे छोटी सामाजिक इकाई है, जबकि पश्चिमी समाज व्यक्ति को प्राथमिक इकाई मानता है। उन्होंने ‘सुख’ और ‘आनंद’ के अंतर को भी स्पष्ट करते हुए भारतीय दर्शन में आनंद को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बताया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु प्रो. कैलाश डागा ने कहा कि चंद्रकांत जी के सुझावों के अनुरूप विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन प्रारंभ करने की दिशा में पहल की जाएगी, ताकि भारतीय दृष्टिकोण और वैश्विक समझ के समन्वय से विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए नए अवसर विकसित हो सकें।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के अधिष्ठाता, निदेशक, शिक्षकगण, शोधार्थी एवं गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। अंत में कुलसचिव वी. सी. गर्ग ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. गिरिमा नागदा ने किया। आयोजन स्नातकोत्तर अध्ययन अधिष्ठाता प्रो. के. बी. जोशी एवं कुलसचिव वी. सी. गर्ग के समन्वय में संपन्न हुआ।

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