
आलेख : डॉ. अनिल मेहता
जब यूरोप की सर्द रात में जले थे भारत के नए चिराग…
बात वर्ष 1926 की है। यूरोप के एक अनजान रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में ठंड से ठिठुरती एक रात… और उस सन्नाटे के बीच बैठे थे डॉ. मोहन सिंह मेहता ‘भाईसाहब’। बाहर ट्रेनें आ-जा रही थीं, लेकिन भाईसाहब के ज़ेहन में भारत के उस भविष्य का खाका बन रहा था, जो अभी तक आज़ाद भी नहीं हुआ था।
वे सोच रहे थे एक ऐसे मंदिर के बारे में, जिसकी दीवारें ईंट-गारे की न हों, बल्कि ‘विचारों’ की हों। एक ऐसा संस्थान, जहाँ लड़का और लड़की कंधे से कंधा मिलाकर सीखें। जहाँ सिर्फ परीक्षा पास करने वाले रोबोट न ढलें, बल्कि स्वाभिमानी, संवेदनशील, चरित्रवान और आज़ाद भारत को संभालने वाले नागरिक तैयार हों।
वह विचार, जो 1926 में एक संवेदनशील दिल में पनपा था, आज वर्ष 2026 में अपने सौ वर्ष (शताब्दी) पूरे कर चुका है। और उसी विचार की ज़मीन पर 1931 में रोपा गया पौधा—’विद्या भवन’—21 जुलाई मंगलवार को अपना 95वाँ स्थापना दिवस मनाने जा रहा है।
महान आत्माओं के स्पर्श से महकती एक पावन माटी
विद्या भवन महज़ कुछ इमारतों और कक्षाओं का समूह नहीं है। यह उन महान आत्माओं की तपस्या का प्रतिफल है, जिन्होंने अपनी हसरतों और सपनों से इसे सींचा। डॉ. मोहन सिंह मेहता के साथ डॉ. के.एल. श्रीमाली, सादिक अली, फतेहलाल वर्डिया और केसरी लाल बोरदिया जैसे मनीषियों ने जब इसकी नींव रखी, तो उनके दिलों में महात्मा गांधी की स्वदेशी सोच, रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्राकृतिक चेतना और स्काउट आंदोलन का अनुशासन उमड़ रहा था।
इसकी गलियों में इतिहास के उन महानायकों के कदमों की आहट आज भी सुनाई देती है, जिन्होंने स्वतंत्र भारत का भाग्य लिखा।
पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह तक…
डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर प्रतिभा पाटिल, डॉ. जाकिर हुसैन और लोकनायक जयप्रकाश नारायण तक…
कितनी ही महान विभूतियों ने यहाँ आकर यहाँ के बच्चों की मासूम आँखों में नए भारत के सपने बोए। इसी प्रांगण की शिक्षिका सरला बेन (मेरी कैथरीन हाइलमन) आगे चलकर बापू की सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल हुईं। यहाँ के हेडमास्टर डॉ. कालू लाल श्रीमाली देश के शिक्षा मंत्री बने, तो पॉलिटेक्निक के प्राचार्य रहे वासुदेव देवनानी आज राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष हैं।
राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया, पूर्व मंत्री बीना काक, महान वैज्ञानिक डॉ. डी.एस. कोठारी, गोवर्धन मेहता, पूर्व विदेश सचिव जगत मेहता व जे.एन. दीक्षित, उद्योगपति अरविंद सिंघल और न्यायमूर्ति गोविंद माथुर—ये सब उसी मिट्टी के दीये हैं, जिनकी रोशनी से आज पूरा देश जगमगा रहा है।
जहां चारदीवारी खत्म होती है, वहीं से ‘शिक्षा’ शुरू होती है
विद्या भवन ने ज़माने को सिखाया कि शिक्षा कागज़ के पन्नों या चारदीवारी में बंद कोई रूढ़िवादी चीज़ नहीं है। यहां शिक्षा खेत की सोंधी महक में है, खेल के मैदान की धूल में है, प्रयोगशाला के नमूनों में है और गांव-जंगलों के सन्नाटे में है।
जब देश में ‘सकारात्मक अनुशासन’ और ‘अनुभव आधारित शिक्षा’ जैसे शब्दों का जन्म भी नहीं हुआ था, तब विद्या भवन की कक्षाओं में बच्चे प्रकृति की गोद में बैठकर जीवन का पाठ सीख रहे थे।
आज जब दुनिया जल संकट, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक असमानता की आग में झुलस रही है, तब विद्या भवन अपनी प्रयोगशालाओं से निकलकर आयड बेसिन और मारवी प्रोजेक्ट के ज़रिए धरती की प्यास बुझाने और सामुदायिक जल प्रबंधन का मर्म समझा रहा है। इसकी गूंज यूनिवर्सिटी ऑफ़ लीड्स, कोपेनहेगन, सिडनी और अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी तक सुनाई देती है। खेत में खड़े उस किसान से पूछिए, जिसके पशुओं का इलाज यहाँ के कृषि केंद्र में हुआ—उसके लिए विद्या भवन किसी मंदिर से कम नहीं है।
“चंद्र विजेता भारत, सूर्य विजेता कब बनेगा…”
वर्ष 1970 में विद्या भवन की एक दीवार पर उकेरी गई वे पंक्तियां—“चंद्र विजेता भारत, सूर्य विजेता कब बनेगा”—महज़ कोई कविता नहीं थीं। वे उस दूरदर्शिता का प्रमाण थीं, जो आज भारत के ‘आदित्य एल-1’ और चंद्रयान मिशन के रूप में अंतरिक्ष का सीना चीर रही हैं। विद्या भवन ने हमेशा अपने बच्चों को आसमान की ओर देखकर बड़े सपने देखने की हिम्मत दी है।
तभी तो यहाँ के बच्चे धनुष-बाण (तीरंदाजी) और शतरंज में देश का नाम रोशन कर रहे हैं, और ‘ऊँची उड़ान’ भरकर देश के शीर्ष आईआईटी और मेडिकल संस्थानों में अपनी जगह बना रहे हैं।
सौ साल की यात्रा : तकनीक के दौर में ‘मानवीय संवेदना’ का दीया
आज से ठीक पांच साल बाद, जब विद्या भवन अपनी स्थापना के भी 100 वर्ष पूरे कर रहा होगा, तब दुनिया शायद और ज़्यादा डिजिटल और कृत्रिम (AI) हो चुकी होगी।
लेकिन ऐसे वक्त में भी विद्या भवन अपने मूल विचार से डिगा नहीं है। यह आज भी दुनिया को सिखा रहा है कि अच्छी शिक्षा मनुष्य को सिर्फ सफल नहीं, संवेदनशील बनाती है। वह सिर्फ रोज़गार का ज़रिया नहीं देती, जीने की दृष्टि देती है। वह सिर्फ एक व्यक्ति का करियर नहीं सँवारती, पूरे समाज और राष्ट्र का चरित्र बनाती है।
आज जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के दौर में भावनाएँ धुँधली पड़ रही हैं, विद्या भवन तकनीक के साथ ‘नैतिकता’ और एआई के साथ ‘मानवीय संवेदना’ का नया मॉडल पेश कर रहा है।
यह 95वां स्थापना दिवस उस विचार की विजय यात्रा का उत्सव है, जो सौ साल पहले एक सन्नाटे में जन्मा था और आज लाखों जिंदगियों को रौशन कर रहा है। यह संकल्प है उस विचार को हमेशा ज़िंदा रखने का—क्योंकि समय भले बदल जाए, लेकिन सच्चाई, संवेदनशीलता और इंसानियत की लौ कभी मध्यम नहीं पड़नी चाहिए।
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