
उदयपुर। उदयपुर में यूरिया की किल्लत को लेकर किसानों के अनोखे विरोध—गधों को माला पहनाने और गुलाब जामुन खिलाने—के बाद अब कृषि विभाग ने रिकॉर्ड आपूर्ति के दावे पेश किए हैं। विभाग का कहना है कि जिले में मांग से कहीं अधिक यूरिया उपलब्ध कराया जा चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती, यही कारण है कि किसान सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए।
संयुक्त निदेशक कृषि (विस्तार) सुधीर वर्मा के अनुसार रबी सीजन 2025-26 में बुवाई का रकबा लक्ष्य से अधिक रहा और अक्टूबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच 27 हजार 780 मैट्रिक टन यूरिया की आपूर्ति की गई, जो आंकी गई मांग से लगभग 4 हजार टन ज्यादा है। सवाल यह उठता है कि यदि आपूर्ति वाकई इतनी सुचारू और पर्याप्त थी, तो किसानों को प्रदर्शन जैसा कदम क्यों उठाना पड़ा?
किसानों का आरोप है कि कागजों में दिख रही आपूर्ति हकीकत में उन्हें समय पर नहीं मिल रही। कई क्षेत्रों में निर्धारित दर पर यूरिया उपलब्ध नहीं हो पा रहा, जबकि विभाग पारदर्शी वितरण और कालाबाजारी समाप्त होने के दावे कर रहा है। यही नहीं, विभाग द्वारा यह स्वीकार करना कि 5 विक्रेताओं के प्राधिकार पत्र निरस्त किए गए, 9 प्रकरणों में निलंबन और 3 मामलों में एफआईआर दर्ज हुई, खुद इस बात का संकेत है कि व्यवस्था पूरी तरह दुरुस्त नहीं है।
विभाग का यह कहना कि सरसों में यूरिया का छिड़काव पूरा हो चुका है और गेहूं में दूसरा छिड़काव चल रहा है, भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि किसान अब भी खाद के लिए भटकने की बात कह रहे हैं। यदि आपूर्ति समय पर और समान रूप से हुई होती, तो न तो विरोध होता और न ही कंट्रोल रूम खोलने की नौबत आती।
कृषि विभाग के दावे और किसानों की परेशानी के बीच यह स्पष्ट है कि समस्या केवल आपूर्ति की संख्या की नहीं, बल्कि वितरण प्रणाली, निगरानी और भरोसे की है। गुलाब जामुन खिलाने जैसा प्रतीकात्मक विरोध प्रशासन की कार्यशैली पर एक व्यंग्यात्मक सवाल बनकर उभरा है—जिसका जवाब केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि जमीनी सुधार से देना होगा।
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