उदयपुर फाइल्स : अपनों में ही छिड़ी जुबानी जंग, दो गुटों में बंटी राय— क्या पुलिस का ‘हथौड़ा’ जायज था या नाजायज?

 

उदयपुर। उदयपुर बीजेपी में कथित वीडियोकांड का मामला अब केवल विपक्षी हमलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खुद सत्ता पक्ष और समर्थकों के बीच एक ‘बड़ी दरार’ पैदा कर चुका है। शहर की फिजाओं में एक ही सवाल गूंज रहा है— “इंसाफ का तरीका क्या हो?”

गुट नंबर 1 : “अपराध के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस” (पुलिस की कार्रवाई का समर्थक)
इस खेमे का मानना है कि मामला एक महिला नेता की अस्मत और गरिमा से जुड़ा है। सोशल मीडिया पर यह गुट आक्रामक तरीके से सवाल पूछ रहा है।

क्या किसी महिला नेता के साथ एआई (AI) के जरिए छेड़छाड़, दुष्कर्म की धमकी या ब्लैकमेलिंग करने वाले के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? क्या अपराधी को घर में घुसकर पकड़ना गलत है? अगर पुलिस ने तत्परता दिखाई, तो इसमें बुरा क्या है?”

इस पक्ष का तर्क है कि अपराधी के मन में खौफ पैदा करने के लिए पुलिस की यह ‘मिडनाइट स्ट्राइक’ जरूरी थी, ताकि भविष्य में कोई भी एआई तकनीक का इस्तेमाल कर किसी महिला की छवि खराब करने की हिम्मत न करे।

गुट नंबर 2 : “कानून की मर्यादा और प्रक्रिया पर सवाल” (प्रशासनिक कार्यशैली का विरोधी)

वहीं, दूसरा गुट इसे ‘लोकतंत्र और कानून का चीरहरण’ बता रहा है। इनका कहना है कि अपराधी को सजा मिले, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन तरीका ‘पुलिसिया गुंडागर्दी’ जैसा नहीं होना चाहिए। इनके मुख्य सवाल हैं:

निजी गुंडे क्यों? पुलिस की दबिश में ‘हथौड़े और सब्बल’ लिए नकाबपोश युवक किस हैसियत से शामिल थे?

आधी रात का ड्रामा : क्या वह वकील कोई आतंकी था कि सुबह होने का इंतजार नहीं किया जा सकता था?

हार्ड डिस्क का खेल : क्या मंशा सिर्फ अपराधी को पकड़ना थी या उन सबूतों (वीडियो) को गायब करना, जिनमें ‘सफेदपोशों’ के चेहरे हो सकते हैं?

सोशल मीडिया बना ‘कुरुक्षेत्र’ : फेसबुक और व्हाट्सएप ग्रुप्स में दोनों गुटों के बीच जमकर ‘शब्द-बाण’ चल रहे हैं। एक पक्ष इसे ‘नारी शक्ति का सम्मान’ बता रहा है, तो दूसरा इसे ‘सत्ता का दुरुपयोग और साक्ष्यों को मिटाने की साजिश’ करार दे रहा है।

कौन सही, कौन गलत?

पार्टी के भीतर छिड़ी इस जंग ने नेतृत्व के लिए भी धर्मसंकट खड़ा कर दिया है। एक तरफ महिला अस्मिता का संवेदनशील मुद्दा है, तो दूसरी तरफ पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठते वे ‘संगीन’ सवाल हैं, जिनका जवाब दिए बिना जनता के बीच जाना मुश्किल हो रहा है।

 

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