
लेखक-प्रो. पी.आर. व्यास
आज मन गहरे शोक और स्तब्धता में है। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (MLSU) के पूर्व कुलपति प्रोफेसर जे.पी. शर्मा के निधन का समाचार केवल एक सूचना नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत है। उनके साथ काम करते हुए और उन्हें करीब से देखते हुए जो अनुभव मुझे मिले, वे आज स्मृतियों के झरोखे से एक-एक कर सामने आ रहे हैं।
प्रोफेसर शर्मा के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता, जो उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करती थी, वह थी उनकी अद्भुत निर्णय क्षमता। शिक्षा जगत में अक्सर योजनाओं पर चर्चाएं तो बहुत होती हैं, लेकिन उन्हें धरातल पर उतारने का साहस कम ही लोग जुटा पाते हैं। प्रो. शर्मा एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जिनकी इच्छाशक्ति के आगे चुनौतियां बौनी साबित होती थीं। मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि वे जिस किसी कार्य की कल्पना करते थे, उसे हकीकत में बदलने का हुनर और संकल्प उनके पास था। वे केवल सपने देखते नहीं थे, बल्कि उन्हें ‘मूर्त रूप’ देते थे।
परिसर के शिल्पी : भवनों में बसती है उनकी याद
विश्वविद्यालय को उच्च शिक्षा के नए आयामों तक ले जाने में उनके बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के विकास को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। आज परिसर में खड़े भव्य भवन उनके दूरदर्शी विजन के गवाह हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के लिए :
शिक्षा संकाय भवन (Faculty of Education Building)
भूगोल भवन (Geography Building)
विजुअल आर्ट्स भवन (Visual Arts Building)
इन भवनों के निर्माण में उनका योगदान ऐतिहासिक रहा है। ये केवल ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं, बल्कि शिक्षा के प्रति उनके समर्पण के जीवंत स्मारक हैं।
एक ‘विलक्षण प्रतिभा’ का विदा होना
आज हमने वास्तव में एक विलक्षण प्रतिभा को खो दिया है। प्रो. शर्मा एक ऐसे कर्मयोगी थे, जिन्होंने अपने कार्यकाल में विश्वविद्यालय को आधुनिकता और गुणवत्ता के साथ जोड़ा। उनकी कार्यशैली और प्रशासनिक पकड़ ने MLSU को एक नई पहचान दिलाई।
उनका जाना मेरे लिए और पूरे विश्वविद्यालय परिवार के लिए एक व्यक्तिगत क्षति है। उनके द्वारा किए गए विकास कार्य और उनकी प्रेरणादायी निर्णय शक्ति आने वाली पीढ़ियों के मार्ग को सदैव आलोकित करती रहेगी।
विनम्र श्रद्धांजलि!
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