उदयपुर में खुशियों के बीच पसरा मातम : जश्न के बारूद ने छीनी घर के चिराग की सांसें, उलेमाओं की अपील दरकिनार करने की कीमत जिंदगी देकर चुकाई

उदयपुर। पैगंबर-ए-इस्लाम की विलादत का पाक दिन, फिजाओं में गूंजती नातें, दरूद और खुशियों से लबरेज चेहरे… लेकिन किसे पता था कि चंद पलों का बेपरवाह उत्साह एक भरे-पूरे परिवार की दुनिया हमेशा के लिए उजाड़ देगा। बुधवार दोपहर उदयपुर के खेमपुरा चौराहे पर ईद मिलादुन्नबी के जुलूस के दौरान एक दर्दनाक हादसे ने 22-25 वर्षीय नौजवान मोहम्मद सलमान की जान ले ली। जिस घर में ईद की खुशियां मनाई जानी थीं, वहां अब सिर्फ मां-बाप की चीखें और बहनों के आंसुओं का सैलाब है।

रेलवे कॉलोनी निवासी मोहम्मद अनवर का बेटा सलमान, जो पांच भाई-बहनों में अपने परिवार का सहारा था, टेंपो चलाकर पाई-पाई जोड़ता और घर की जिम्मेदारियां उठाता था। जुलूस में शामिल होकर वह भी जश्न मना रहा था, लेकिन ‘मिनी स्टील गन’ में रखकर फोड़े जा रहे ‘आलू बम’ के अत्यधिक दबाव ने उस लोहे के पाइप का पिछला ढक्कन उड़ा दिया। वह लोहे का टुकड़ा सीधे सलमान की गर्दन में जा धंसा। पलक झपकते ही खून का फव्वारा फूटा और मुस्कुराता हुआ नौजवान जमीन पर गिरकर अचेत हो गया। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उसकी नब्ज थम चुकी थी; डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

एक कड़वा सच और सबक : कब जागेगा हमारा समाज?

यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारे समाज की उस नासमझी और जिद का नतीजा है जो आए दिन मासूमों की जान ले रही है।

हर साल त्यौहारों और जुलूसों से पहले उलेमा-ए-किराम, शहर के जिम्मेदार और बुजुर्ग मंचों व मस्जिदों से बार-बार गुजारिश करते हैं कि जश्न का तरीका सादगी, इबादत और अमन का होना चाहिए। बारूद, पटाखे और जानलेवा स्टंट कभी किसी खुशी का हिस्सा नहीं हो सकते। लेकिन अफसोस कि चंद सेकंड के रोमांच और दिखावे के फेर में युवा पीढ़ी इन नसीहतों को हवा में उड़ा देती है।

देसी स्टील गन और तेज आवाज वाले बमों से निकलने वाला धुआं और धमाका किसी का कद बड़ा नहीं करता, बल्कि अक्सर ऐसे ही चिरागों को हमेशा के लिए बुझा देता है।

अब संभलने का वक्त है…

सलमान तो चला गया, पीछे छोड़ गया जिंदगी भर का गम और एक अधूरा परिवार। लेकिन यह हादसा पूरे समाज के लिए एक बड़ा और दर्दनाक सबक छोड़ गया है:

दिखावे और हुड़दंग पर रोक जरूरी: मजहबी या सामाजिक जलसों को बारूद के शोर से दूर रखकर ही उनकी पाकीजगी और सुरक्षा को बरकरार रखा जा सकता है।

अभिभावकों और युवाओं की जवाबदेही: बड़ों को जहां बच्चों की गतिविधियों पर सख्ती से नजर रखनी होगी, वहीं युवाओं को समझना होगा कि चंद सेकंड का शोर उनकी पूरी जिंदगी और उनके परिवार की खुशियों से बड़ा नहीं है।

जब तक हम उलेमाओं और समझदारों की नेक सलाह को अपनी आदत नहीं बनाएंगे, तब तक ऐसी लापरवाहियां यूं ही किसी मां की गोद और बहनों का सहारा छीनती रहेंगी।

 

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