
उदयपुर। उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन द्वारा खांजीपीर और आयड़ को ‘मिनी पाकिस्तान’ करार देने और 25 प्रतिशत अपराधों का ठीकरा इन्हीं क्षेत्रों पर फोड़ने का कथित बयान न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि संकीर्ण चुनावी ध्रुवीकरण की पुरानी और थकी हुई सियासत का खुला प्रदर्शन है। जब एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपनी ही विधानसभा की जनता को सांख्यिकीय और भौगोलिक रूप से ‘विभाजित’ करने लगे, तो यह उस पद की गरिमा और संवैधानिक शपथ पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
पुरानी राजनीति और नई पीढ़ी की सोच के बीच की खाई
विधायक महोदय का पूरा राजनीतिक जीवन जिस विचारधारा और संघ के सांचे में ढला है, उसमें इस प्रकार की शब्दावली का इस्तेमाल शायद उनके लिए सामान्य हो। राष्ट्रीय स्तर पर जब संसद के भीतर साथी सांसदों के लिए नफरती शब्दों पर चुप्पी साध ली जाती है, तो स्थानीय स्तर पर ऐसे बयानों का आना अप्रत्याशित नहीं लगता। हालांकि, यह त्रासदी है कि सत्ता और संगठन में दशकों बिताने के बाद भी वे आज की ‘जेन-जी’ (Gen-Z) और आधुनिक युवा पीढ़ी की प्रगतिशील मानसिकता को समझने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। आज का युवा धर्म और क्षेत्र के नाम पर बांटी जाने वाली पहचान से आगे बढ़कर अवसरों और विकास की बात करता है।
अपराध का चश्मा बनाम हकीकत का आईना
विधायक का यह दावा कि कुल अपराधों का 25 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं इलाकों से आता है, तथ्यों से कोसों दूर और पूर्वाग्रह से ग्रसित प्रतीत होता है:
अपराध की कोई तय सीमा नहीं: कानून व्यवस्था का बुनियादी सच यह है कि अपराध किसी एक मोहल्ले या बस्ती की बपौती नहीं होते। कॉलेजों, वीआईपी इलाकों और मंत्रियों-विधायकों के आवासों के इर्द-गिर्द भी संगीन जुर्म, हत्याएं और स्नैचिंग की घटनाएं दर्ज होती रही हैं।
शिक्षा और प्रतिभा की अनदेखी: पुलिस थानों के चुनिंदा रिकॉर्ड देखने के बजाय यदि विधायक महोदय पिछले पांच वर्षों के 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम देख लेते, तो शायद यह संकीर्ण तस्वीर बदल जाती। खांजीपीर और आयड़ के दर्जनों बच्चे 80 से 95 प्रतिशत अंक लाकर राज्य सरकार की विदेश अध्ययन स्कॉलरशिप हासिल कर रहे हैं। इन बस्तियों से डॉक्टर, इंजीनियर, सीए, शिक्षक, अधिवक्ता और विभिन्न सरकारी सेवाओं में चयनित होकर युवा मुख्यधारा में अपना योगदान दे रहे हैं।
जिम्मेदारियों से ध्यान भटकाने की रणनीति?
बस्तियों पर भड़काऊ लेबल चस्पा करना बेहद आसान है, लेकिन एक विधायक के तौर पर असली परीक्षा इन सवालों के जवाब देने में है:
क्या इन बस्तियों में रहने वाले मेहनतकश नागरिकों को न्यूनतम मजदूरी और बुनियादी नागरिक अधिकार मिल रहे हैं?
क्या इन इलाकों के सरकारी स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों, सड़कों और पेयजल की स्थिति सुधारने के लिए विधायक स्तर पर कोई ठोस पहल हुई?
क्या रोजगार और कौशल विकास के अवसर इन इलाकों तक निष्पक्षता से पहुंचे?
सच्चा जननायक अपनी जनता को बांटने के बजाय उन्हें जोड़ने का काम करता है। ऐसे भ्रामक और आहत करने वाले बयानों पर पर्दा डालने के बजाय विधायक महोदय को अपने शब्दों पर खेद व्यक्त करना चाहिए। समय आ गया है कि जनप्रतिनिधि अपने इलाकों को ‘मिनी पाकिस्तान’ जैसे विवादित नैरेटिव में उलझाने के बजाय वहां के विकास, शिक्षा और बुनियादी हक की जवाबदेही तय करें।
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