
उदयपुर। ओसवाल सभा उदयपुर के चुनाव को लेकर उत्पन्न हुआ विवाद केवल एक संगठनात्मक मतभेद नहीं, बल्कि समाज की आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर उठते गंभीर प्रश्नों को उजागर करता है। चुनाव संयोजक और सह संयोजक का इस्तीफा इस बात का संकेत है कि संस्था के भीतर प्रशासनिक पारदर्शिता, निष्पक्षता और उत्तरदायित्व को लेकर गहरा असंतोष व्याप्त है।
संयोजकों द्वारा दिए गए इस्तीफे में मतदाता सूची की त्रुटियों, नए सदस्यों की जांच तथा अद्यतन और पारदर्शी वोटर लिस्ट उपलब्ध न कराए जाने जैसे मुद्दे सामने आए हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि समाज की चुनावी प्रक्रिया में आवश्यक संस्थागत सहयोग और सूचना की उपलब्धता का अभाव है। कार्यालय सहायक के त्यागपत्र के बाद सीमित समय में चुनाव संपन्न कराने में असमर्थता जताना, व्यवस्थागत कमजोरी और प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करता है।
दूसरी ओर, अध्यक्ष पद के प्रत्याशी संजय भंडारी द्वारा लगाए गए आरोप कि निवर्तमान अध्यक्ष प्रकाश कोठारी निष्पक्ष चुनाव नहीं चाहते, समाज में सत्ता के केंद्रीकरण और प्रभाव के दुरुपयोग की आशंका को जन्म देते हैं। मतदाता सूची को संयोजक समिति की सहमति के बिना जारी करना और मतदाताओं की संख्या में वृद्धि का आरोप, चुनावी विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार है।
इसके विपरीत, निवर्तमान अध्यक्ष का यह तर्क कि चुनाव अब स्वतंत्र निर्वाचन अधिकारी द्वारा कराए जा रहे हैं, सत्ता से दूरी बनाने और जिम्मेदारी स्थानांतरित करने का प्रयास प्रतीत होता है। किंतु समाज के प्रबुद्धजनों की बैठक में चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप को लेकर की गई कड़ी आपत्ति यह स्पष्ट करती है कि नेतृत्व और आम सदस्यों के बीच विश्वास का संकट गहराता जा रहा है।
समग्र रूप से यह विवाद दर्शाता है कि जब सामाजिक संस्थाओं में लोकतांत्रिक मूल्यों, पारदर्शिता और संवाद की कमी होती है, तो आंतरिक राजनीति टकराव का रूप ले लेती है। ओसवाल सभा का यह घटनाक्रम समाज के लिए एक चेतावनी है कि निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव प्रक्रिया ही संगठनात्मक एकता और सामाजिक विश्वास की आधारशिला होती है।
Keywords : Socio-political conflict, Internal democracy, Election transparency, Power struggle, Institutional trust, Voter list controversy, Leadership accountability
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