
उदयपुर।
जब से स्वायत्त शासन विभाग ने लॉटरी में उदयपुर नगर निगम की मेयर सीट ‘अनारक्षित’ घोषित की है, शहर के राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है। नींद गायब है और खुली-बंद आंखों से केवल ‘महापौर की कुर्सी’ नजर आ रही है…
उदयपुर: आज जब से जयपुर में लॉटरी खुली और खबर आई कि उदयपुर नगर निगम का मेयर पद सामान्य (General) वर्ग के लिए आरक्षित हुआ है, तब से दिल की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। मन ही नहीं लग रहा, रातों की नींद उड़ गई है।
उत्साह का आलम यह था कि एक बार तो समर्थकों को फोन करके आतिशबाजी करने तक का बोल दिया था। लेकिन तभी अचानक झटका लगा… ‘अरे भाई, अगर खुद का वार्ड जनरल नहीं आया तो क्या करूंगा?’
दिमाग के घोड़ों को दौड़ाना शुरू किया, कुछ खास लोगों को फोन मिलाया। वहां से ढाढस बंधाया गया—”अरे चिंता क्यों करते हो? पुराना वार्ड तो है ही, पास वाला वार्ड भी तो है। फिर जहां दुकान और फैक्ट्री है, वहां का भी विकल्प खुला है। कोई न कोई तो जनरल आ ही जाएगा!”
टिकट का गुणा-गणित: ‘गुलाबजी’ या जिलाध्यक्ष?
वार्ड तो सेट हो जाएगा, लेकिन सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है—’टिकट कैसे आएगा?’
गुलाबजी से बात करें या जिलाध्यक्ष से? मन में विचार आया कि कटारिया साहब (गुलाबजी) से बात कर लूं। फिर याद आया कि इस बार तो जिलाध्यक्षजी की ज्यादा चलेगी, जो खुद कटारिया खेमे के विरोधी माने जाते हैं। बात तो दोनों से ही करनी पड़ेगी।
लेकिन अगर जिलाध्यक्ष खुद दावेदार बन गए तो? फिर तो वही होगा—’मरता क्या न करता’, वापस गुलाबजी के दर पर ही धोक लगानी पड़ेगी।
जयपुर की सेटिंग: केवल स्थानीय स्तर पर बात नहीं बनेगी। जयपुर में भी डोरियां खींचनी पड़ेंगी। प्रदेशाध्यक्ष, मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री… किसी न किसी के जरिए वीआईपी सिफारिश लगानी ही पड़ेगी।
रिस्क फैक्टर: क्या 7वीं बार बनेगा बीजेपी का बोर्ड?
एक बड़ा रिस्क और भी है। क्या उदयपुर में सातवीं बार बीजेपी का बोर्ड बनेगा? एंटी-इंकंबेंसी का माहौल है, वार्डों का परिसीमन हो गया है और वार्डों की संख्या भी बढ़ गई है। जेब से गाढ़ी कमाई खर्च कर भी दी और बोर्ड ही नहीं बना तो?
“नहीं-नहीं, उदयपुर तो बीजेपी का अभेद्य गढ़ है!” दिल ने दिलासा दिया।
पर फिर ख्याल आया—“गढ़ है तो क्या हुआ? इस बार तो ‘जेन जी’ (Gen Z) ने हवा का रुख ही बदल रखा है!” माहौल जानने के लिए घर के बच्चों और युवाओं से बात की कि ‘शहरी सरकार में बीजेपी का क्या लगता है?’
जवाब मिला—”अंकल, बीजेपी राम मंदिर चंदा विवाद और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर घिरी हुई है। आप अपना सोच लो! हम तो जेन जी हैं… जहां सीरियस मामला होता है वहां हम मजाक कर लेते हैं, और जहां मजाक होता है वहां सीरियस हो जाते हैं!”
खैर, अब राजनीति में उतरे हैं तो जुआ तो खेलना ही पड़ेगा। हारे तो जुआ, और जीत गए तो सीधे ‘मेयर साब’!
कांग्रेस का दांव: क्या डॉ. सीपी जोशी बदलेंगे गेम?
एक एंगल और भी है… अगर कांग्रेस से आसानी से टिकट का जुगाड़ हो जाए तो कैसा रहेगा?
छह बार से लगातार हार रही कांग्रेस को इस बार बोर्ड बनाने की पूरी उम्मीद दिख रही है। पास वाले अंकल भी बोल रहे थे कि “इस बार तो मेरा वोट परिवर्तन के नाम पर कांग्रेस को ही जाएगा।” लेकिन समस्या यह है कि लोकल स्तर पर कांग्रेस में कोई खास दम या रणनीति नजर नहीं आती। हर वार्ड से वहां तो पहले ही चार-चार मेयर प्रत्याशी घूम रहे हैं!
हां, अगर डॉ. सीपी जोशी खुद शहर की कमान अपने हाथ में ले लें, तो गेम बदल सकता है। फिर गुलाबजी और सीपी साहब की पुरानी दोस्ती भी पर्दे के पीछे रंग ला सकती है। जिला प्रमुख भी सामान्य है, तो राजनीति में ‘एक तू खींच, एक मैं खींचूं’ वाली स्थिति बन सकती है।
मार्गदर्शक मंडल और ‘कार्पोरेट’ वाली राजनीति
बीजेपी में एक बात और समझ नहीं आ रही। जो नेता चार-चार बार पार्षद रह चुके हैं, उपसभापति और समिति अध्यक्षों की कुर्सियां तोड़ चुके हैं, वो आज भी दावेदारी ठोक रहे हैं! अब पार्टी भी क्या करे? ऐसे पुराने दिग्गजों को विश्राम देने के लिए शायद कोई ‘मार्गदर्शक मंडल’ बनाना पड़ जाए।
बहरहाल, आजकल की राजनीति पूरी तरह किसी कॉरपोरेट दफ्तर जैसी हो गई है। किसी को रोकना हो तो दुनिया भर के नियम बना दो, और किसी अपने को टिकट देना हो तो वही नियम चुटकी में तोड़ दो!
पर जो भी हो, बनना तो मुझे मेयर ही है… और मैं बनूंगा! अब जब रात को नींद ही नहीं आ रही है, तो क्या किया जाए? खुली और बंद, दोनों आंखों से बस एक ही सपना देखते हैं—’माननीय महापौर!’
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