
उदयपुर:
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा।
मशहूर सूफी संत हज़रत सूफी मोहम्मद नज़ीर अहमद क़ादरी, चिश्ती, रिज़वी, नूरी रहमतुल्लाह अलैहे के दूसरे सालाना उर्स-ए-पाक का आगाज़ आज यानी 5 मुहर्रम को परचम कुशाई (ध्वजारोहण) की मुक़द्दस रस्म के साथ होने जा रहा है। यह तक़रीब ब्रह्मपोल वाक़िये हज़रत ईमरत रसूल बाबा दरगाह परिसर में मुनअक़िद की जाएगी।
सूफी साहब के शैदाई (मुरीद) हिदायत उल्ला ने तफ़्सीलात देते हुए बताया कि दो बरस कब्ल 6 मुहर्रम को सूफी नज़ीर अहमद क़ादरी साहब ने इस दारे-फ़ानी (नश्वर संसार) से पर्दा फ़रमाया था। उनकी आख़िरी आरामगाह (मज़ार-ए-अक़्दस) हज़रत ईमरत रसूल बाबा दरगाह परिसर में ही मक़ामी है, जहाँ उन्हें सुपुर्दे-खाक किया गया था।
ख्वाजा ग़रीब नवाज़ के सूफियाना पैग़ाम के अलमबरदार थे सूफी साहब
सूफी साहब ने अपनी पूरी ज़िन्दगी सुल्तान-उल-हिंद हुज़ूर ख्वाजा ग़रीब नवाज़ (रजि.) के सूफियाना पैग़ाम और तालीमात को अवाम-उन-नास (आम लोगों) तक पहुँचाने में वक़्फ़ कर दी। उनकी ज़ाती ज़िन्दगी और अख़्लाक़ पर ख़्वाजा साहब की शरियत व तरीक़त की शिक्षाओं का गहरा असर था। उनके हयात-ए-तैयबा (जीवनकाल) में अक़ीदतमंद अपनी परेशानियां लेकर उनके आस्ताने पर हाज़िर होते थे और सूफी साहब की रूहानियत व दुआओं की बरकत से फ़ैज़याब होकर लौटते थे।
आस्ताने पर आज भी जारी है फ़ैज़ का सिलसिला
सूफी साहब के विसाल (देहवासान) के बाद भी उनकी मज़ार-ए-अक़्दस पर अक़ीदतमंदों और जायरीन का हुजूम अपनी मन्नतें और मुरादें लेकर हाज़िर होता है। ज़ायरीन का अटूट यक़ीन है कि सूफी साहब के तवस्सुत और दुआओं के तुफ़ैल आज भी लोगों की दिली मुरादें पूरी होती हैं। ऐसे बेइंतहा शवाहिद (उदाहरण) मौजूद हैं जहाँ बे-औलाद वालिदैन ने सूफी साहब की दुआओं की बरकत से औलाद की नेमत हासिल की। अक़ीदतमंदों की हाज़िरी और अक़ीदत का यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।
उर्स के तक़रीबात का शिड्यूल (कार्यक्रम)
उर्स की कमेटी के मुताबिक, मजहबी प्रोग्रामों के तहत आज यानी 21 जून 2026 (इतवार) को बाद नमाज़-ए-असर परचम कुशाई की रस्म अदा की जाएगी। इसके बाद, इसी रोज़ बाद नमाज़-ए-इशा महफ़िल-ए-मिलाद शरीफ़ का एहतेमाम होगा, जिसमें नात-ख़्वान और उलेमा बारगाहे-रिसालत में नज़राना-ए-अक़ीदत पेश करेंगे।
अगले दिन, यानी 22 जून 2026 (पीर) को 6 मुहर्रम के मुक़द्दस मौक़े पर दोपहर नमाज़-ए-ज़ोहर से कब्ल (पहले) ‘क़ुल की फ़ातेहा’ ख़्वानी होगी, जिसके बाद आम ओ ख़ास के लिए ‘लंगर-ए-आम’ (तबर्रुक) तक़सीम किया जाएगा।
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