गुलाबबाग में सुखिया सोमवार के मेले बंद, प्रशासनिक तानाशाही का शिकार हुई उदयपुर की बरसों पुरानी परंपरा, जनता में आक्रोश

गंदगी का बहाना बनाकर परंपरा पर ताला, रोज़गार छीनने और सांस्कृतिक विरासत को कुचलने पर आमादा नगर निगम

उदयपुर। सावन के पवित्र महीने में उदयपुर की ऐतिहासिक और लोक संस्कृति की पहचान रहे ‘सुखिया सोमवार’ के पारंपरिक मेलों पर प्रशासनिक फरमान का हथौड़ा चला दिया गया है। गुलाबबाग में सावन के हर सोमवार को सजने वाले इन मेलों को अचानक बंद कर दिए जाने से न केवल शहरवासियों में, बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों से आने वाले श्रद्धालुओं और आम जनता में ज़बरदस्त रोष व्याप्त है।

वर्षों से चली आ रही एक जीवंत परंपरा को जिस गैर-जिम्मेदाराना और अड़ियल रवैये से बंद किया गया है, उसने नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर नैतिक और प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं।

“गंदगी” का हास्यास्पद बहाना : अपनी ही नाकामी पर पर्दा डाल रहा निगम

जब इस तानाशाही फैसले के खिलाफ जनता और जनप्रतिनिधियों ने आवाज़ उठाई, तो अधिकारियों और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों ने बेहद शर्मनाक और गैर-जिम्मेदाराना तर्क दिया कि “मेले से गुलाबबाग में गंदगी फैलती है।”

बड़ा सवाल : क्या नगर निगम अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी से भाग रहा है?

शहर की सफाई व्यवस्था बनाए रखना और सार्वजनिक आयोजनों के बाद कचरा प्रबंधन (Waste Management) करना नगर निगम का बुनियादी कर्तव्य है। अपनी अक्षमता, लापरवाही और सफाई का उचित प्रबंधन न कर पाने की नाकामी को छिपाने के लिए एक सदियों पुरानी जन-परंपरा का ही गला घोंट देना कहाँ का न्याय है? अगर गंदगी ही वजह है, तो फिर निगम का अमला और संसाधन किस काम के हैं?

जन-मनोरंजन पर प्रहार और गरीबों की रोजी-रोटी पर लात

गुलाबबाग का यह मेला केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन मात्र नहीं था। यह उदयपुर की आम जनता, बच्चों और बुजुर्गों के लिए सावन के मौसम में सस्ते और सुलभ मनोरंजन का प्रमुख केंद्र था।

रोजगार पर डाका: इस मेले से सैकड़ों छोटे व्यापारियों, रेहड़ी-पटरी वालों, खिलौने-झूले वालों और स्थानीय कारीगरों की आजीविका जुड़ी हुई थी। सावन के इन चार-पांच हफ्तों में वे अपनी पूरे साल की आस संजोते थे। निगम ने एक झटके में उनसे उनके रोज़गार का हक भी छीन लिया है।

संस्कृति को मिटाने की साजिश: आधुनिकता और प्रशासनिक सुविधा के नाम पर उदयपुर की लोक-संस्कृति और पारंपरिक मेलों को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है, जो अत्यंत चिंताजनक है।

मौके पर पहुंचा जनाक्रोश, पूर्व पार्षदों और स्थानीय लोगों ने खोला मोर्चा

घटनास्थल पर पूर्व पार्षद दिनेश गुप्ता और गौरव प्रताप सिंह सहित बड़ी संख्या में शहरवासियों ने एकत्रित होकर नगर निगम और प्रशासन के इस तुगलकी फरमान के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया।

प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि परंपराओं और जन-भावनाओं से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि नगर निगम ने तुरंत अपनी हठधर्मिता छोड़कर अतिरिक्त सफाई कर्मचारियों की तैनाती के साथ मेले के आयोजन को पुनः शुरू नहीं कराया, तो शहरवासी उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

तुगलकी रवैया छोड़ व्यवस्था सुधारे प्रशासन

गुलाबबाग में ‘सुखिया सोमवार’ के मेले बंद करने का फैसला प्रशासनिक विफलता और अकर्मण्यता का प्रतीक है। स्वच्छता का हवाला देकर किसी उत्सव पर रोक लगाने के बजाय प्रशासन को स्वच्छता की बेहतर व्यवस्था करनी चाहिए थी। उदयपुर की जनता माँग करती है कि इस परंपरा को तुरंत बहाल किया जाए और जन-भावनाओं का आदर करते हुए मेले को फिर से शुरू करवाया जाए।

 

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