ममता की जीत : जब आश्रम की चौखट पर मां से लिपटकर रो पड़ा बिछड़ा बेटा, तीन साल का लंबा इंतजार खत्म

फोटो एंड रिपोर्ट : कमल कुमावत

उदयपुर | कहते हैं कि वक्त कितने ही गहरे जख्म दे दे, लेकिन एक मां की उम्मीद और दुआ कभी खाली नहीं जाती। उदयपुर के ‘अपना घर आश्रम’ में आज एक ऐसा ही दृश्य जीवंत हो उठा, जिसे देख वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। तीन साल पहले जो बेटा वक्त की धुंध में कहीं खो गया था, आज वह अपनी मां की ममता भरी छांव में वापस लौट गया।

यह कहानी शुरू होती है 13 अक्टूबर 2023 को, जब उदयलाल आयड पुलिया के पास अत्यंत दयनीय और मानसिक रूप से अस्वस्थ अवस्था में मिले थे। आश्रम की रेस्क्यू टीम उन्हें सहारा देकर अपने साथ लाई। महीनों की निस्वार्थ सेवा, उचित उपचार और निरंतर काउंसलिंग का ही परिणाम था कि उदयलाल की याददाश्त की परतों पर जमी धूल साफ होने लगी। उन्होंने धुंधली यादों के बीच अपना नाम और गाँव ‘उमरड़ा’ बताया।

आश्रम की टीम लगातार परिजनों की खोज में जुटी रही, लेकिन सफलता हाथ नहीं लग रही थी। आखिरकार, 8 अप्रैल को अंकेश मीणा के जरिए एक उम्मीद की किरण जागी। पता चला कि उदयलाल की वृद्ध मां, सवागी बाई, गाँव भेकड़ा (भलों का गुड़ा) में आज भी अपने लाल की राह देख रही हैं।

शुक्रवार का दिन आश्रम के इतिहास में भावुकता का नया अध्याय लिख गया। जब सवागी बाई अपने भतीजे के साथ आश्रम पहुँचीं, तो नजारा देखने लायक था। तीन साल से पत्थर बनी मां की आंखें अपने बेटे को सही-सलामत देख सावन की तरह बरस पड़ीं।

“मेरा बेटा मिल गया, अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए।”
— सवागी बाई (भावुक स्वर में)

मां ने बताया कि उदयलाल मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण बिना बताए कहीं चले गए थे। उन्होंने बहुत ढूंढा, पर नियति ने उन्हें ‘अपना घर’ की दहलीज तक पहुँचा दिया था।

ससम्मान विदाई : मानवता की मिसाल

पुनर्मिलन के इस मार्मिक अवसर पर आश्रम के संरक्षक सुरेश विजयवर्गीय, अध्यक्ष गोपाल कनेरिया और सचिव अशोक कोठारी सहित अन्य पदाधिकारियों ने उदयलाल का तिलक लगाया और उपरना ओढ़ाकर उन्हें ससम्मान विदा किया।

आश्रम की टीम की इस संवेदना ने यह सिद्ध कर दिया कि अगर सेवा का भाव सच्चा हो, तो बिछड़े हुए अपनों को फिर से मिलाया जा सकता है। आज उदयलाल सिर्फ अपने घर ही नहीं लौटे, बल्कि एक मां को उसका खोया हुआ संसार वापस मिल गया है।

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