
सैयद हबीब, उदयपुर
सिनेमा का एक बुनियादी नियम है—बड़ी फ़िल्में स्टार्स से चलती हैं, लेकिन कालजयी फ़िल्में किरदारों से बनती हैं। स्टार वक्त के साथ बूढ़े हो जाते हैं, उनकी चमक धुंधली पड़ जाती है। मगर जो सच्चे ‘कैरेक्टर एक्टर’ होते हैं, वे स्क्रीन पर कम वक़्त के लिए आकर भी दर्शकों के ज़ेहन में हमेशा के लिए ‘फ़्रीज़-फ़्रेम’ हो जाते हैं। ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म ‘आनंद’ का वह संवाद आज भी रूह को छूता है—“बाबूमोशाय, ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं।” उदयपुर की फिज़ाओं में प्रोफेसर विजय श्रीमाली इसी सिनेमाई फलसफे का जीता-जागता और मुकम्मल किरदार थे।
आज जब उनकी एक और पुण्यतिथि हमारे सामने है, तो सिनेमा की रील की तरह उनकी यादें हमारी आँखों के प्रोजेक्टर पर फिर से घूमने लगी हैं।
क्लोज़-अप में भी बेदाग मुस्कान
गुरु दत्त की फ़िल्मों में अक्सर एक उदास मगर बेहद ईमानदार चेहरा दिखता था, जो दुनिया के ढोंग को बेनकाब करता था। श्रीमाली जी भी ज़िंदगी के उस क्लोज़-अप शॉट की तरह थे, जिसमें बनावटीपन का कोई फ़िल्टर नहीं था। उनकी स्क्रिप्ट में झूठ के लिए कोई री-टेक नहीं था।
सूरजपोल चौराहे की वह डेडी जी की दुकान, जहां उनकी सुबह की चाय का शॉट शुरू होता था, वह महज़ एक लोकेशन नहीं थी। वह तो एक ऐसा जीवंत सेट था, जहां शहर की राजनीति, छात्रों के संघर्ष और आम आदमी की तकलीफ़ों का लाइव संपादन (Editing) होता था। वे जब यूनिवर्सिटी के कुलपति बने, तो उन्होंने सिर्फ़ ‘व्हाइट कॉलर’ प्रशासन नहीं चलाया। उन्होंने राजकपूर की फ़िल्म ‘आवारा’ या ‘श्री 420’ के उस नायक की तरह काम किया, जो ऊंचे महलों में बैठकर भी ज़मीन की धूल को नहीं भूलता। महज़ तीन महीने की लघु-फ़िल्म (Short Film) जैसी कार्यावधि में उन्होंने सुशासन का वह क्लाइमेक्स रच दिया, जिसे लोग बरसों की ‘मल्टी-स्टारर’ सरकारों में भी नहीं देख पाते।
संघर्ष का पार्श्व संगीत
जैसे के. आसिफ़ की ‘मुग़ल-ए-आज़म’ अपने भव्य सेट्स के साथ-साथ अपने किरदारों के टकराव के लिए जानी जाती है, वैसे ही श्रीमाली जी का जीवन भी द्वंद्व से अछूता नहीं था। उनका कड़ा विरोध भी हुआ। लेकिन सिनेमाई परदे पर खलनायक या विरोधी जितने मज़बूत होते हैं, नायक का चरित्र उतना ही निखर कर सामने आता है। उनके धुर विरोधी भी आज परदे के पीछे यह स्वीकार करते हैं कि लाइट, कैमरा और एक्शन के इस दौर में, वह शख्स भीतर और बाहर से एक ही वेशभूषा में रहता था।
उनके जाने के बाद भी उनकी कहानी में ‘द एंड’ (The End) का बोर्ड नहीं लगा। वे आज भी जीवित हैं—
किसी बेसहारा छात्र की रुकी हुई फ़ीस के बैकग्राउंड स्कोर में।
किसी लाचार पिता की ढलती उम्र के क्लोज़-अप शॉट में, जिसका हाथ उन्होंने थाम लिया था।
और उनके अजीज दोस्तों—युधिष्ठिर कुमावत, अनिल सिंघल, कमर इक़बाल की आँखों के उस थियेटर में, समाज के लोगों की अनगिनत कहानियों में, जहां श्रीमाली जी का दौर आज भी ‘हाउसफुल’ चलता है।
रक्त का यह दान: एक मुकम्मल री-रिलीज़
इस पुण्यतिथि पर जो रक्तदान शिविर आयोजित हो रहा है, वह महज़ एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं है। यह तो एक महान निर्देशक की उस विरासत की ‘री-रिलीज़’ है, जिसने ताउम्र इंसानी रिश्तों को सींचने के लिए अपने हिस्से का ख़ून-पसीना एक कर दिया।
के आसिफ़, कमाल अमरोही या बिमल रॉय जैसे निर्देशकों की फ़िल्में ख़त्म होने के बाद जब थियेटर की लाइटें जलती हैं, तो दर्शक भारी कदमों से बाहर निकलता है, लेकिन उसके भीतर एक संवाद गूंजता रहता है। प्रो. विजय श्रीमाली की ज़िंदगी की फ़िल्म का परदा भले ही गिर चुका हो, लेकिन थियेटर से बाहर निकली जनता के दिलों में आज भी रफ़ी साहब की वही आवाज़ गूंज रही है—
“तुम हमें यूं भुला न पाओगे…
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे…”
हां, श्रीमाली जी! इस ज़िंदगी के परदे पर आपका किरदार अमर है, और हम आज भी ताली बजा रहे हैं।
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