उदयपुर नगर निगम चुनाव : बीजेपी में टिकटों पर अंदरूनी महाभारत, पर्यवेक्षकों के पैनल दरकिनार, दफ्तर से फोन पर मंगवाई जा रही दावेदारी, कार्यकर्ताओं में उबाल

उदयपुर। उदयपुर नगर निगम चुनाव की सरगर्मियां तेज होते ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर टिकट वितरण को लेकर घमासान चरम पर पहुंच गया है। शहर की स्थानीय राजनीति में ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ और ‘कैडर आधारित व्यवस्था’ के दावों की हवा उस वक्त निकलती नजर आई, जब टिकट चयन की तय लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार कर ‘पर्दे के पीछे से खेल’ शुरू हो गया। जहां बड़े-बड़े दिग्गज अलग-अलग वार्डों से अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं, वहीं संगठन कार्यालय से चुनिंदा चेहरों को फोन कर ऐन वक्त पर आवेदन मंगाने की कार्यशैली ने जमीनी कार्यकर्ताओं के सब्र का बांध तोड़ दिया है।

पर्यवेक्षकों की राय ‘हवा-हवाई’, पैनल से बाहर के नामों पर मेहरबानी?

चुनाव से पहले पार्टी ने बड़े जोर-शोर से वार्ड स्तर पर पर्यवेक्षक भेजे, रायशुमारी का ढोंग रचा और दावेदारों के बायोडाटा लेकर 3-3 नामों के पैनल तैयार करने का दावा किया था। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है।

अचानक एंट्री : कई वार्डों में ऐसे चेहरों ने अंतिम क्षणों में पार्टी दफ्तर में आवेदन जमा कराए हैं, जिनका नाम न तो पर्यवेक्षकों की प्राथमिक सूची में था और न ही उन्होंने स्थानीय स्तर पर शक्ति प्रदर्शन या दावेदारी की थी।

दफ्तर से ‘कॉलिंग’ : सबसे बड़ा विवाद पार्टी कार्यालय से किए जा रहे उन ‘खास फोन कॉल्स’ को लेकर है, जिनमें कुछ पसंदीदा लोगों को सीधे फोन कर दावेदारी पेश करने का न्योता दिया जा रहा है।

दरी बिछाने वाले कार्यकर्ता ठगे से, ‘पैराशूट दावेदारों’ की चांदी पर सवाल

संगठन की इस दोहरी नीति से उन समर्पित कार्यकर्ताओं में गहरा आक्रोश और असमंजस है, जो पिछले पांच वर्षों से वार्डों में पार्टी का झंडा उठाए घूम रहे थे।

पार्टी के अंदरूनी हलकों में यह सवाल तीखे स्वर में पूछा जा रहा है कि यदि टिकट का फैसला बंद कमरों में ‘फोन कॉल’ और ‘नेताओं की व्यक्तिगत पसंद’ से ही होना था, तो पर्यवेक्षकों को भेजकर कार्यकर्ताओं का समय और ऊर्जा क्यों बर्बाद की गई?

जो लोग जमीनी स्तर पर जनता और संगठन के बीच सक्रिय नहीं थे, उन्हें अचानक पिछले दरवाजे से एंट्री दिलाकर किसके राजनीतिक भविष्य को साधने की कोशिश की जा रही है?

गुटबाजी और भितरघात का गहराता खतरा

वरिष्ठ और दिग्गज नेताओं की एक से अधिक वार्डों पर नजर और अचानक थोपे जा रहे दावेदारों के चलते पार्टी में आंतरिक असंतोष सुलग रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि टिकट चयन में पारदर्शिता नहीं बरती गई और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर मनमानी पर्चियां चलाई गईं, तो निकाय चुनाव में पार्टी को भितरघात और कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता का बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

 

 

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