
उदयपुर। फ्रेम के पीछे की दुनिया कभी-कभी फ्रेम से ज़्यादा खूबसूरत होती है। आज उदयपुर में वही पल था—जब कैमरे ने सांस रोक ली और शहर बादलों के आगोश में समा गया।
सुबह की पहली किरणें फतहसागर झील के ऊपर उतरने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन सामने धुंध का परदा था। जैसे कोई फिल्म का दृश्य हो—जहां सब कुछ है, पर फिर भी आधा छिपा हुआ। मैं, कमल कुमावत, कैमरा उठाकर झील किनारे खड़ा था। हवा में ठंड थी, नमी थी, और एक अजीब-सी खामोशी। झील की लहरें भी जैसे धीरे चल रही थीं, ताकि उस खामोशी को तोड़ा न जाए।

अरावली की चारों पहाड़ियां इस वक्त बादलों की चादर में लिपटी हुई थीं। कहीं से धुंध झरने की तरह उतरती दिखती, तो कहीं पहाड़ी की गोद में छिपी रहती। कैमरे की लेंस पर भी नमी जमने लगी थी—पर हर बूंद उस फ्रेम को और जिंदा बना रही थी। हर क्लिक में उदयपुर कुछ और खुलता जा रहा था, कुछ और रहस्यमय बनता जा रहा था।
फतहसागर की सतह पर पक्षियों की हलचल थी—लेकिन उड़ानें भी सधी हुईं। जैसे उन्हें भी पता हो कि ये मौसम किसी फोटो जर्नलिस्ट के लिए वरदान है। कैमरे की नज़र से देखा जाए तो हर पंख की हरकत, हर पानी की लहर, हर धुंध का टुकड़ा एक कविता है।
झील किनारे बैठे कुछ लोग अपने गर्म कपड़ों में लिपटे हुए थे। उनकी सांसें भी धुंध बनकर उड़ती दिखीं। बच्चों के हाथों में गुब्बारे थे, लेकिन हवा इतनी ठंडी थी कि वे भी ढीले पड़ चुके थे। वहीं एक बूढ़ा मल्लाह नाव के सहारे खड़ा था—उसके चेहरे की झुर्रियों में भी मौसम की नमी उतर आई थी। मैंने क्लिक किया—उसकी आंखों में झील का प्रतिबिंब था और पीछे आसमान का धूसर रंग।

फोटोग्राफी का सबसे कठिन पल वो होता है जब आप तय नहीं कर पाते कि कैमरा उठाएं या बस देखें। उदयपुर आज उसी दुविधा में डाल रहा था। हर फ्रेम इतना खूबसूरत कि उसे देखकर कैमरा खुद क्लिक करना चाहता था।
धुंध के बीच से जब सूरज ने झांकने की कोशिश की, तो फतहसागर की लहरों पर सुनहरी परत तैरने लगी। उस पल में कैमरे ने जो कैद किया, वो सिर्फ रोशनी नहीं थी—वो मौसम का एहसास था। एक फोटोग्राफ जो दिखने से ज़्यादा महसूस होने के लिए था।
अरावली की ढलानों पर बूंदाबांदी जारी थी। हवा में ठंड थी, पर उसकी खुशबू मिट्टी के साथ मिलकर किसी पुराने किस्से जैसी लग रही थी। शहर की सड़कों पर सन्नाटा था, लेकिन इस सन्नाटे में भी एक संगीत था—पेड़ों की सरसराहट, दूर मंदिर की घंटी और पानी की गिरती बूंदों की ताल।
मैंने कैमरा नीचे रखा और कुछ देर बस देखा। ये वही उदयपुर था, जो अपने महलों, झीलों और रोशनी के लिए जाना जाता है—लेकिन आज इसका रंग कुछ और था। ये शहर आज खुद में लिपटा हुआ था, अपने साए में, अपने मौसम में।
धुंध के भीतर झांकता उदयपुर एक पेंटिंग बन गया था—जिसका हर स्ट्रोक किसी बादल ने खींचा था, हर छाया किसी पहाड़ी ने दी थी, और हर रंग को कैमरे ने चुपचाप संजो लिया था।
इस मौसम में तस्वीरें सिर्फ बनती नहीं, सांस लेती हैं। फतहसागर की वो सुबह, अरावली की वो ओट, हवा की वो ठंडक—सब कुछ कैमरे के अंदर कैद होकर भी बाहर ज़िंदा है।
उदयपुर आज सिर्फ शहर नहीं था, एक एहसास था—जो कैमरे से निकलकर आंखों में बस गया।
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