
इस्लामाबाद | लगभग आधी सदी के कड़वे संघर्ष के बाद पहली बार हुई अमेरिका-ईरान सीधी वार्ता एक जटिल मोड़ पर आकर रुक गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस्लामाबाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्पष्ट किया कि 21 घंटे की मैराथन बातचीत के बावजूद दोनों पक्ष किसी अंतिम समझौते पर नहीं पहुँच सके। अमेरिका ने अपना ‘अंतिम और सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव’ (Final and Best Offer) ईरान को सौंप दिया है और अब गेंद ईरान के पाले में है।
जेडी वेंस के अनुसार, बातचीत के विफल होने का सबसे मुख्य कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम है।
डोनाल्ड ट्रंप का लक्ष्य : अमेरिका ने शर्त रखी है कि ईरान न केवल परमाणु हथियार बनाना बंद करे, बल्कि ऐसे सभी साधन भी खत्म करे जिससे भविष्य में वह जल्दी परमाणु शक्ति बन सके।
ईरान का इनकार : वेंस ने कहा कि हमें ईरान से वह ‘राजनीतिक इच्छाशक्ति’ और ‘ठोस प्रतिबद्धता’ नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी।
पाकिस्तान की ‘शानदार’ मध्यस्थता
भले ही समझौता नहीं हुआ, लेकिन जेडी वेंस ने पाकिस्तान की भूमिका की जमकर सराहना की।
उन्होंने प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर का विशेष आभार व्यक्त किया।
वेंस ने स्पष्ट किया कि समझौते में विफलता का कारण पाकिस्तानी मध्यस्थता नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच की गहरी शर्तें और वैचारिक मतभेद थे।
ट्रंप का उदासीन रुख: “फर्क नहीं पड़ता”
जहाँ वेंस इस्लामाबाद में 21 घंटे की मेहनत का हवाला दे रहे थे, वहीं व्हाइट हाउस से डोनाल्ड ट्रंप का बयान काफी तीखा रहा। ट्रंप ने पत्रकारों से कहा, “ईरान के साथ समझौता हो या न हो, मुझे फर्क नहीं पड़ता।” ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका पहले ही ईरान को सैन्य रूप से हरा चुका है और अब वे ‘दुनिया पर उपकार’ करने के लिए होर्मुज स्ट्रेट को साफ कर रहे हैं।
समुद्र में नया टकराव : होर्मुज स्ट्रेट पर दावों की जंग
वार्ता के समानांतर होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है:
सेंटकॉम का दावा: अमेरिकी सेना ने कहा कि उसने समुद्र से बारूदी सुरंगें हटाने का काम शुरू कर दिया है और दो गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रायर (USS फ्रैंक ई पीटर्सन और USS माइकल मर्फ़ी) वहां से गुजर चुके हैं।
ईरान का खंडन: ईरान ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि किसी भी जहाज़ का गुजरना अभी भी ईरानी सेना के नियंत्रण में है।
नेतन्याहू का लेबनान कार्ड
इसी बीच इजरायली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू ने एक बड़ा बयान देकर वार्ता को नई दिशा देने की कोशिश की है।
उन्होंने लेबनान के साथ शांति वार्ता को मंज़ूरी दे दी है।
शर्तें: हिज़्बुल्लाह का नि:शस्त्रीकरण और टिकाऊ शांति। अगले हफ्ते वॉशिंगटन में दोनों देशों के राजदूतों के बीच संघर्ष विराम पर चर्चा हो सकती है।
विश्लेषणात्मक सारांश : कूटनीतिक जीत या सैन्य दबाव?
वेंस का ‘फ़ाइनल ऑफ़र’: यह एक ‘टेक इट ऑर लीव इट’ (स्वीकार करो या छोड़ो) वाली स्थिति है। वेंस ने संकेत दिया है कि अमेरिका अब और लचीला रुख नहीं अपनाएगा।
ईरान की दुविधा : ईरान ने वरिष्ठ अधिकारियों (वेंस) से मिलने की मांग तो पूरी करवा ली, लेकिन वह ट्रंप प्रशासन की कड़ी शर्तों (खासकर परमाणु मुद्दे) पर झुकने को तैयार नहीं दिख रहा।
पाकिस्तान की कूटनीतिक जीत : भले ही समझौता न हुआ हो, लेकिन इस्लामाबाद ने खुद को एक वैश्विक मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर लिया है। ‘इस्लामाबाद प्रक्रिया’ को अब दुनिया भर में मान्यता मिल गई है।
भविष्य की राह : यदि ईरान अमेरिका के ‘फ़ाइनल ऑफ़र’ को ठुकराता है, तो मध्य-पूर्व में फिर से बड़े सैन्य संघर्ष और आर्थिक प्रतिबंधों का दौर शुरू हो सकता है।
आधी सदी बाद हुई यह मुलाकात ऐतिहासिक तो है, लेकिन शांति अभी भी कोसों दूर नजर आ रही है। ट्रंप की ‘तेजी’ और ईरान की ‘शर्तें’ आपस में टकरा रही हैं। अब दुनिया की नजरें ईरान के जवाब पर टिकी हैं।
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