– आयड़ जैन तीर्थ में चातुर्मासिक प्रवचन की धूम जारी
– श्रावक जीवन के 36 कर्तव्यों की विवेचना की

उदयपुर। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में मंगलवार को चातुर्मासिक मांगलिक प्रवचन में साध्वियों ने श्रावक जीवन के 36 कर्तव्य के विवेचन के बारे में बताया । महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ के आत्म वल्लभ सभागार में सुबह 7 बजे दोनों साध्वियों के सानिध्य में अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई।

चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने कहां कि श्रावक जीवन के 36 कर्तव्य के विवेचन में प्रथम कर्तव्य है परमात्मा की आज्ञा का पालन करना। उन्होंने बताया कि अनंत-अनंत काल से आज दिन तक अपनी आत्मा का जो संसार परिभ्रमण हुआ और अभी तक मुक्ति नहीं हो पाई, उसका मुख्य कारण जिनत्माओं के प्रति अरुचि और उन आज्ञाओं से विपरीत वर्तन ही है।
यदि संसार परिभ्रमण से बचना है तो हमें अपने हृदय के प्रत्येक स्पंदन में, रक्त की बूंद-बूंद में, प्रत्येक श्वासोच्छवास में जिनाज्ञा का प्रेम भर देना होगा। जिनाज्ञा का पालन तो दूर रहा, यदि हम को जिनाज्ञाओं के प्रति हृदय से पूर्ण रूप से बहुमान का भाव भी पैदा हो गया तो भी हमारी मोक्ष की मंजिल दूर नहीं है। ” आज्ञाराद्वा विराद्धाच शिवाय च भवायच जिनेश्वर भगवंत की आज्ञा का पालन ही मोक्ष का कारण है और जिनेश्वर भगवंत की आज्ञा का भंग ही संसारवृद्धि का कारण है। हमें संसार में भटकना नही है। संसार से अटकना है । जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
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