ब्रिटेन-अमेरिका स्पेशल रिलेशनशिप की अग्निपरीक्षा : क्या किंग चार्ल्स अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ से ट्रंप को कर पाएंगे शांत?

 

स्रोत : द गार्जियन

लंदन/वॉशिंगटन | दुनिया की सबसे चर्चित और विवादास्पद ‘दोस्ती’ एक बार फिर बड़े इम्तिहान के दौर से गुजर रही है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के निर्देश पर किंग चार्ल्स III इस महीने के अंत (27 से 30 अप्रैल) में अमेरिका की आधिकारिक यात्रा पर जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या किंग चार्ल्स की दशकों पुरानी कूटनीति और ‘सॉफ्ट पावर’, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तीखे तेवरों को नरम कर पाएगी?

‘खिलौना’ एयरक्राफ्ट करियर और कूटनीति की चुनौती

यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और ब्रिटेन के रिश्तों में काफी कड़वाहट देखी जा रही है। राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में ब्रिटिश विमान वाहक पोतों को ‘खिलौना’ करार दिया है और रॉयल नेवी की क्षमताओं पर सवाल उठाए हैं। ऐसे में किंग चार्ल्स के कंधों पर ब्रिटेन की साख बचाने और व्यापारिक व सांस्कृतिक संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की भारी जिम्मेदारी है।

ट्रंप और प्रोटोकॉल का ‘पंगा’

व्हाइट हाउस में होने वाली इस मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं, क्योंकि ट्रंप को प्रोटोकॉल तोड़ने के लिए जाना जाता है। इस यात्रा की शुरुआत से पहले ही ट्रंप ने दो बड़े झटके दिए हैं:

नाम में चूक: उन्होंने सार्वजनिक रूप से किंग चार्ल्स को ‘प्रिंस’ कहकर संबोधित किया।

सुरक्षा से समझौता: शाही परिवार की परंपरा के अनुसार यात्रा की तारीखें गुप्त रखी जाती हैं, लेकिन ट्रंप ने पहले ही 27-30 अप्रैल की तारीखों का खुलासा कर दिया।

दो विपरीत ध्रुव: पर्यावरण बनाम रियल एस्टेट

किंग चार्ल्स और डोनाल्ड ट्रंप वैचारिक रूप से एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। चार्ल्स जहां पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ वास्तुकला और जलवायु परिवर्तन के बड़े पैरोकार हैं, वहीं ट्रंप इन मुद्दों को अक्सर खारिज करते आए हैं। जानकारों का मानना है कि चार्ल्स अपनी ‘मीठी बातों’ और फ्लैटरिंग (चापलूसी) की कला का इस्तेमाल कर ट्रंप के ‘सिंपल हार्ट’ तक पहुंचने की कोशिश करेंगे।

इतिहास का ‘फ्लैशबैक’ : 1939 का वो सफल दौरा

इतिहास गवाह है कि शाही दौरों ने कई बार बिगड़े रिश्तों को सुधारा है। साल 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध से ठीक पहले किंग जॉर्ज VI और क्वीन एलिजाबेथ की अमेरिका यात्रा ने ब्रिटिश-अमेरिकी संबंधों में नई जान फूंक दी थी। तब शाही जोड़े ने पहली बार ‘हॉट डॉग’ खाकर अमेरिकी जनता का दिल जीत लिया था। क्या चार्ल्स भी वैसा ही कुछ ‘जादू’ कर पाएंगे?

आजादी की 250वीं वर्षगांठ का बहाना

इस यात्रा का आधिकारिक कारण अमेरिका की आजादी की 250वीं वर्षगांठ (Declaration of Independence) का जश्न है। यह एक विडंबना ही है कि चार्ल्स उस ‘किंग जॉर्ज III’ के वंशज हैं जिनसे अमेरिका ने युद्ध लड़कर आजादी हासिल की थी।

अंतिम राय: क्या बदलेगा समीकरण?
विशेषज्ञों का मानना है कि किंग चार्ल्स की यह यात्रा कुछ दिनों के लिए माहौल को शांत जरूर कर सकती है, लेकिन कीर स्टार्मर की सरकार के लिए ट्रंप का ‘पंचिंग बैग’ वाला रवैया बदलना मुश्किल होगा।

निष्कर्ष: चार्ल्स के लिए एक ही तसल्ली की बात है—अमेरिका में राष्ट्रपतियों का कार्यकाल सीमित होता है, लेकिन ‘किंग’ का पद स्थायी है। अब देखना यह है कि 27 अप्रैल को जब ‘सॉफ्ट पावर’ का मुकाबला ‘हार्ड पावर’ से होगा, तो जीत किसकी होती है।

 

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