आध्यात्म और सेवा का समन्वय : भगवान को उपवास नहीं, सेवा के लिए हाथ चाहिए, नारायण सेवा संस्थान में प्रशांत अग्रवाल ने दिया जीवन रूपांतरण का संदेश

उदयपुर। सच्चा उपवास केवल अन्न त्यागने का नाम नहीं, बल्कि मन के भीतर छिपे विकारों को तिलांजलि देने और अपनी ऊर्जा को दीन-दुखियों की सेवा में लगाने का संकल्प है। पूजा जब तक व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में न उतरे, तब तक वह अधूरी है। यह प्रेरक विचार नारायण सेवा संस्थान के ‘अपनों से अपनी बात’ कार्यक्रम के दौरान संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने व्यक्त किए। सेवा, संस्कार और स्वावलंबन के त्रिवेणी संगम बने इस आयोजन में देश के कोने-कोने से पहुंचे दिव्यांगजन, उनके परिजन और कंप्यूटर, मोबाइल व सिलाई विधा में कौशल प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे युवा शामिल हुए।

पौराणिक प्रसंगों और व्यावहारिक जीवन दर्शन को जोड़ते हुए प्रशांत अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि जब हम केवल अपने लिए कुछ त्यागते हैं तो वह उपवास कहलाता है, लेकिन जब वही पुण्य किसी असहाय और जरूरतमंद के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया जाता है, तो वह सच्ची प्रार्थना बन जाता है।

एकादशी और आत्मसंयम: 11 इंद्रियों पर नियंत्रण ही असली विजय
एकादशी के आध्यात्मिक मर्म को समझाते हुए उन्होंने पौराणिक कथाओं के जरिए मन की शुद्धि के व्यावहारिक सूत्र दिए:

भीतरी शत्रु पर विजय: मुर दैत्य और एकादशी देवी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि असली लड़ाई बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि भीतर बैठे क्रोध, अहंकार और नकारात्मकता से है। महर्षि मेधा के दृष्टांत से उन्होंने सभी को क्रोध पर नियंत्रण पाने का संकल्प दिलाया।

सिद्धांतों पर अडिगता: राजा रुक्मांगद और मोहिनी की कथा के जरिए सीख दी कि जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी विषम क्यों न हों, मनुष्य को अपने नैतिक मूल्यों और वचनों से नहीं डिगना चाहिए।

इंद्रियों की दिशा बदलना: राजा अंबरीष और महर्षि दुर्वासा के प्रसंग से उन्होंने स्पष्ट किया कि भक्ति का अर्थ इंद्रियों का दमन करना नहीं, बल्कि उनकी दिशा सकारात्मकता की ओर मोड़ना है। हाथ वही रहें, लेकिन वे किसी को ठेस पहुंचाने के बजाय दूसरों के आंसू पोंछने और सेवा करने में लगें।

11 पर संयम: आध्यात्मिक दृष्टि से एकादशी पांच ज्ञानेंद्रियों, पांच कर्मेंद्रियों और मन—इन 11 शक्तियों पर नियंत्रण का अभ्यास है।

‘भगवान को हमारा उपवास नहीं, सेवा के लिए हाथ चाहिए’: 335 दिव्यांगों को नई रोशनी
प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि जीवन की सार्थकता इस बात में नहीं है कि वह कितना लंबा है, बल्कि इसमें है कि उपलब्ध समय का उपयोग किस नेक काम में हुआ। राजा खट्वांग ने अंतिम समय में भी प्रभु भक्ति चुनी थी; आज के दौर में सेवा के लिए समर्पित किया गया हर क्षण पूजा के समान है।

अहमदाबाद में संपन्न हुए ‘नारायण मॉड्यूलर आर्टिफिशियल लिंब फिटमेंट कैंप’ का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि 335 दिव्यांगजनों को आधुनिक कृत्रिम अंग लगाकर आत्मनिर्भरता और नई उम्मीद का उपहार दिया गया है। जब कोई व्यक्ति किसी असहाय, वृद्ध या दिव्यांग के काम आता है, तभी धर्म धरातल पर उतरता है।

गुरु-शिष्य परंपरा और सीखने की ललक: दत्तात्रेय के 24 गुरुओं से सीखें
समारोह में कौशल प्रशिक्षण ले रहे युवाओं को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हुए उन्होंने गुरु-शिष्य संबंधों की गरिमा और निरंतर सीखने की भूख को रेखांकित किया:

मार्गदर्शक के रूप में गुरु: भगवान श्रीकृष्ण व महर्षि सांदीपनी तथा रामकृष्ण परमहंस व स्वामी विवेकानंद के उदाहरणों से उन्होंने कहा कि गुरु केवल किताबी ज्ञान नहीं देता, बल्कि व्यक्तित्व को तराश कर उसे सही दिशा देता है।

हर परिस्थिति से सीख: भगवान दत्तात्रेय द्वारा प्रकृति और जीव-जंतुओं को मिलाकर बनाए गए 24 गुरुओं का दृष्टांत देते हुए उन्होंने कहा कि यदि मन में जिज्ञासा हो, तो व्यक्ति जीवन की हर परिस्थिति, चुनौती और छोटी-छोटी घटनाओं से सीख सकता है।

कर्मयोग ही सफलता की कुंजी: गीता के अमर संदेश ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते…’ का हवाला देते हुए उन्होंने युवाओं से कहा कि वे फल की व्यर्थ चिंता किए बिना अपने कर्तव्य, हुनर और लक्ष्य पर पूरी निष्ठा से काम करें।

संस्थान परिसर में प्रशिक्षणार्थियों से सीधा संवाद करते हुए प्रशांत अग्रवाल ने उनके अनुभवों को जाना और विश्वास दिलाया कि शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण का अंतिम उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, अनुशासित और समाजोपयोगी नागरिक बनकर राष्ट्र निर्माण में हाथ बंटाना है।

 

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