पर्दे के पीछे का उदयपुर : जब हर चौखट पर सजता है दरबारे-खास और किरदार बदलते हैं नकाब

सैयद हबीब, उदयपुर।

सिनेमा के सुनहरे दौर की एक कालजयी फिल्म थी ‘मुगल-ए-आजम’। के. आसिफ ने जब दरबारे-आम और दरबारे-खास का तसव्वुर खींचा था, तो वहां शहंशाह के तख्त के इर्द-गिर्द खड़े दरबारी सिर्फ सलाम बजाने नहीं आते थे; वे दरअसल हवा का रुख सूंघते थे कि आने वाले कल में सल्तनत की चाबी किसके हाथ जाने वाली है। आज उदयपुर की झीलें भले शांत दिख रही हों, मगर नगर निगम चुनाव के इस मौसम में शहर के सियासी महलों और चुनावी दफ्तरों में ठीक वही दृश्य जीवंत हो उठा है।

खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी के उन संभावित चेहरों के ठिकानों पर नजर डालिए, जिन्हें शहर की गलियों में ‘भावी मेयर’ मानकर पूजा जाने लगा है। वहां सुबह से देर रात तक जो मजमा लगता है, वह शेक्सपियर के किसी नाटक के उस दृश्य की तरह है जहां हर पात्र एक ही वक्त में कई मुखौटे पहने घूम रहा होता है।

इस रंगमंच पर आने वाले लोग केवल झंडा उठाने वाले साधारण कार्यकर्ता नहीं हैं। यहां सरकारी दफ्तरों की फाइलों में कलम घिसने वाले बाबू और साहब हैं, शहर के रसूखदार बिल्डर और व्यवसायी हैं, और वे खांटी सत्ता-साधक हैं जिनकी निष्ठा किसी विचार से नहीं, केवल ‘कुर्सी’ के साथ बंधी होती है। कमाल की बात यह है कि वही चेहरा जो सुबह एक दावेदार के ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ ‘आप ही शहर का उद्धार कर सकते हैं’ की तान छेड़ रहा होता है, वही शख्स शाम ढलते ही दूसरे दावेदार की चौखट पर मत्था टेकते हुए कह रहा होता है—’हवा तो सिर्फ आपके नाम की चल रही है।’ यह इंसानी फितरत का वह बहुरूपिया अंदाज है, जिस पर कभी गुरुदत्त ने ‘प्यासा’ में कटाक्ष किया था—‘ये तख्तों, ये ताजों, ये महलों की दुनिया… मिले भी तो क्या है!’

सबसे ज्यादा दिलकश दृश्य तो अंधेरा घिरने के बाद उभरता है। विरोधी विचारधारा और प्रतिद्वंद्वी पार्टियों के वे दिग्गज, जो दिन के उजाले में प्रेस नोट जारी कर एक-दूसरे की सियासत का मर्सिया पढ़ते हैं, वे ही रात के सन्नाटे में पिछले दरवाजे से इन दावेदारों के कमरों में दाखिल होते हैं। वहां बंद दरवाजों के पीछे जो कानाफूसी होती है, उसका लब्बोलुआब सिर्फ इतना होता है—‘सामने से तो पार्टी की मजबूरी है भाई साहब, लेकिन भीतर से हमारा पूरा कुनबा आपके साथ है।’ राजनीति का यह अंडरग्राउंड नेटवर्क दरअसल उस सिनेमाई सस्पेंस थ्रिलर जैसा है, जहां क्लाइमेक्स आने तक यह पता नहीं चलता कि कातिल कौन है और हमदर्द कौन।

उधर, कुर्सी के ख्वाब देख रहे प्रत्याशियों की अपनी अलग बेचैनी है। वे खुद अपने फोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट खंगाल रहे हैं। उन कार्यकर्ताओं और परिचितों को मान-मनुहार कर बुलाया जा रहा है, जिनकी अपने समाज या बिरादरी में दो-चार रसूखदार वोटरों पर पकड़ है। ‘अरे भाई, आप हमारे पुराने साथी हैं, कम से कम अपनी गली और अपने समाज में तो चार बातें हमारे हक में कहिए।’ यह गिड़गिड़ाहट और सियासी सौदेबाजी बताती है कि नगर निगम का यह दंगल सिर्फ 80 वार्डों की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसानी महत्वाकांक्षाओं, झूठी वफादारियों और नफा-नुकसान का वह खुला बाजार है जहां हर कोई अपना सिक्का चलाने की जुगत में लगा है।

यह चुनाव भी एक दिन गुजर जाएगा, नतीजे आएंगे और कोई एक शख्स उस लाल बत्ती या मेयर की कुर्सी पर आसीन हो जाएगा। तब यही भीड़ उस अकेले विजेता के इर्द-गिर्द सिमट जाएगी और बाकी दरवाजे वीरान हो जाएंगे। राज कपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ में यूं ही नहीं कहा था—‘तमाशा खत्म होता है, और मदारी अपनी पोटली बांधकर चल देता है।’ उदयपुर के चुनावी अखाड़े में भी अभी तमाशा अपने शबाब पर है, और हर कोई अपनी-अपनी स्क्रिप्ट पूरी शिद्दत से जी रहा है।

 

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