उदयपुर नगर निगम चुनाव वार्ड-60 : अदब के घूंघट से निकलकर वोट मांगती है सियासत

सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर।

 

सिनेमा के सुनहरे दौर की एक मशहूर फिल्म का गीत याद आता है—‘घूंघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।’ कबीर का यह फलसफा रूहानी था, मगर जब यह सियासी गलियारों में उतरता है, तो पिया की जगह ‘मतदाता’ आ खड़ा होता है। राजस्थान के उदयपुर की सर्द-गर्म हवाओं के बीच नगर निगम चुनाव के वार्ड नंबर 60 की चौखट पर आज लोकतंत्र कुछ इसी कश्मकश में खड़ा दिखाई देता है।

महिला के लिए आरक्षित इस वार्ड में मुकाबला ठीक वैसा ही रोचक हो चला है, जैसे आखिरी ओवरों में सांसें रोक देने वाला महिला क्रिकेट या हॉकी का कोई रोमांचक मुकाबला। एक तरफ भाजपा की सुषमा चौहान हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस की प्रेमलता पालीवाल। बीच में निर्दलीय खुशबू कमलेश मेहता ने आकर समीकरणों की बिसात उलझा दी है, वहीं बसपा की पूजा और किन्नर प्रत्याशी मीरा कुंवर सखी की मौजूदगी इस चुनावी कहानी में जिंदगी के कई अनदेखे रंग जोड़ देती है।

मगर इन सबके बीच निगाहें ठहरती हैं भाजपा प्रत्याशी सुषमा चौहान पर, जो गली-कूचों में हाथ जोड़े निकलती हैं तो चेहरे पर एक लंबा घूंघट खिंचा होता है। चुनावी सफर में जब कुछ पुराने लोगों ने टोक दिया, तो उन्होंने घूंघट की ओट जरा सी सरका दी। यह दृश्य हमारे समाज के दो पाटों को एक साथ दिखाता है—एक तरफ आधुनिक व्यवस्था का वोट मांगती महिला, दूसरी तरफ सदियों पुरानी रीतियों को साधती गृहस्थी।

जब उनसे लोकतंत्र के इस तरह ‘घूंघट’ में होने पर सवाल पूछा गया, तो उनका जवाब किसी सधे हुए संवाद की तरह सामने आया—“घूंघट पर्दा नहीं, परंपरा है और अदब का प्रतीक है। मेरी आवाज वहां तक जरूर पहुंचेगी, जहां तक उसे पहुंचना चाहिए।”

मुंबई जैसे महानगर से दसवीं की पढ़ाई पूरी कर ससुराल की चौखट संभालने वाली सुषमा चौहान के पिता वायुसेना में थे और भाई फौज में। अनुशासन उनके खून में रचा-बसा है, इसलिए कार्यकर्ताओं के बीच वे महज एक उम्मीदवार नहीं, सम्मान से ‘भाभीसा’ कहलाती हैं। यह अलग बात है कि सियासत का टिकट उन्हें पति बलवीर सिंह राणावत के रसूख की बदौलत मिला, जो हमारे उपमहाद्वीप के चुनावी फलक की एक जानी-पहचानी और पुरानी हकीकत है।

लेकिन परदे और परंपराओं के पीछे इस इलाके की असल जिंदगी बड़ी पथरीली है। इंडस्ट्रियल एरिया का यह वार्ड करीब 4,400 मतदाताओं (जिसमें 2100 महिलाएं और 2300 पुरुष हैं) की उम्मीदों का घर है। यहां बिल्डरों के मुनाफे ने कालोनियां तो खड़ी कर दीं, मगर सरकारी मास्टर प्लान के वे नक्शे न जाने कहां खो गए, जिनमें चौड़ी सड़कें दिखाई गई थीं। दिन-रात दौड़ते भारी वाहनों का धुंआ, बदहाल रास्ते, बिजली-पानी का संकट और महिलाओं के लिए रोजगार की तंगी—ये सब वो समस्याएं हैं जिनका कोई घूंघट नहीं होता। वे नंगी आंखों से साफ दिखाई देती हैं। युवाओं में नशा भी इस क्षेत्र का बड़ा मुद्दा है। उनका वादा है कि बतौर पार्षद वे वार्ड को नशा मुक्त कराने का भी इरादा रखती हैं।

कहा जाता है कि सियासत में चेहरे बहुत मायने रखते हैं, मगर लोकतंत्र का असल इम्तिहान इस बात में है कि घूंघट के पीछे का संकल्प कितना मजबूत है। अदब और परंपरा की अपनी जगह है, लेकिन जब धूल, धुएं और गड्ढों से जूझती अवाम के हक की बात आए, तो घूंघट के भीतर से उठने वाली आवाज में कितनी गूंज होगी—फैसले का असली पर्दा इसी सवाल पर उठना बाकी है।

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