
– भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर
पहले जब भी आतंकी हमलों की घटनाएँ सामने आती थीं, तो उनमें शामिल लोग आमतौर पर गरीब, अशिक्षित और गुमराह वर्ग से होते थे। लेकिन हाल के दिल्ली ब्लास्ट में शिक्षित, सम्पन्न और व्हाइट कॉलर वर्ग के लोगों का नाम सामने आना समाज और शासन दोनों के लिए गहरी चिंता का विषय है। यह सिर्फ ब्रेनवॉश का परिणाम नहीं, बल्कि कुछ नए और खतरनाक उद्देश्यों की ओर संकेत कर रहा है।
यह घटना बताती है कि अब आतंकवाद सीमाओं के पार से नहीं, बल्कि हमारे ही बीच से जन्म लेने लगा है। जब उच्च शिक्षा प्राप्त और समृद्ध वर्ग के लोग इस राह पर उतर आते हैं, तो यह देश की सोच, दिशा और नीतियों के लिए बड़ा खतरा बन जाता है।
भारत में शिक्षा और चिकित्सा को सदियों से सेवा का क्षेत्र माना गया है। इनसे व्यक्ति के भीतर संवेदना, मानवीयता और राष्ट्रभक्ति का भाव जगाने की अपेक्षा की जाती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन दोनों क्षेत्रों को पूरी तरह व्यापार का रूप दे दिया गया। निजी संस्थानों में लाभ कमाने की होड़ बढ़ी और सरकार का नियंत्रण धीरे-धीरे कमजोर होता गया।
नतीजा यह हुआ कि कुछ जगहों पर गलत विचारधाराएँ, संप्रदायिक सोच और समाज को बाँटने वाली ताकतें धीरे-धीरे सक्रिय होने लगीं। शिक्षा के मंदिरों में अब केवल ज्ञान नहीं, बल्कि विचारों का भी व्यापार होने लगा है। कट्टरपंथी समूहों ने इसे एक अवसर की तरह लिया और शिक्षित युवाओं को अपने जाल में फँसाना शुरू कर दिया।
यह स्थिति बताती है कि खतरा अब सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि विचारों के स्तर पर खड़ा हो गया है। जब पढ़े-लिखे दिमाग गलत दिशा में चल पड़ते हैं, तो उनका असर बहुत गहरा और दूरगामी होता है। यह न केवल समाज में भय और अस्थिरता फैलाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सोच को भी प्रभावित करता है।
अब सरकार को इस दिशा में गंभीर और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। शिक्षा, चिकित्सा और सामाजिक संस्थानों को सख्त नियामक नियंत्रण में लाया जाए। इसके लिए एक अलग मंत्रालय या कैडर बनाकर ऐसे संस्थानों की नीतियों, पारदर्शिता और विचारधारा पर निगरानी रखी जाए। साथ ही शिक्षा प्रणाली में मानवीय मूल्यों, सामाजिक समरसता और देशभक्ति को फिर से प्राथमिकता दी जाए।
भारत की आत्मा “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना में बसती है। यह देश हमेशा एकता, प्रेम और करुणा का प्रतीक रहा है। अगर इस धरती पर विभाजन और कट्टरता की जड़ें फैलने लगीं, तो यह केवल सरकार या समाज की नहीं, हम सबकी हार होगी।
अब समय है कि देश की नीतियाँ केवल विकास पर नहीं, बल्कि विचारों की सुरक्षा पर भी ध्यान दें। तभी भारत फिर से उस दिशा में आगे बढ़ सकेगा जहाँ ज्ञान, शांति और समरसता का सूरज कभी अस्त नहीं होता।
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