लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में…: मेरठ दंगे की आग में जिसने अपना आशियाना खोया, भोपाल में विदा हुआ उर्दू अदब का वो अज़ीम चिराग

नई दिल्ली/भोपाल।

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”

उर्दू अदब को महफ़िलों और ख़ास ओ आम की बंदिशों से निकालकर अवाम की ज़ुबान देने वाले, हिंदुस्तान की रूह और अज़ीम शायर डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 28 मई 2026 को भोपाल में 91 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं थे, बल्कि वे भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास, विस्थापन और सांप्रदायिक सौहार्द के सबसे मुखर और भावुक गवाह थे। उनकी लिखी ग़ज़लें और शेर भारत और पाकिस्तान के शीर्ष राजनेता अपनी रैलियों और संसद के भाषणों में अक्सर पढ़ा करते हैं। लेकिन विडंबना देखिए, लोकप्रियता और शख़्सियत की यह बुलंद ऊँचाई भी उन्हें और उनके परिवार को नफ़रत की उस उन्मादी आग से नहीं बचा सकी, जिसने उनके जीवन की पूरी दिशा बदल दी थी।

मेरठ दंगा 1987: जब आंखों के सामने खाक हो गया आशियाना

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस शासन के अंतिम दौर (1987-88) में पूरा सूबा सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। मलियाना, हाशिमपुरा और मुरादाबाद के साथ मेरठ में भीषण हिंसा भड़की। अप्रैल 1987 में मेरठ के शास्त्री नगर इलाके में दंगाइयों की एक उन्मादी भीड़ ने बशीर बद्र के घर पर हमला कर दिया। उस भयावह सुबह बशीर बद्र किसी काम से बाहर थे, जबकि उनका छोटा बेटा ‘बिन्नू’ पास के पार्क में खेल रहा था। भीड़ ने घर में तोड़फोड़ कर उसे आग के हवाले कर दिया। इस घटना में उनका घर और वर्षों की रचनात्मक मेहनत (साहित्यिक रचनाएं व कीमती किताबें) जलकर राख हो गई। दंगे के बाद उनके पड़ोसी मिश्रा जी ने बशीर साहब को अपना गैराज रहने के लिए दिया, जहाँ उन्होंने आग से बची-खुची चंद किताबों को सहेजकर एक छोटी सी लाइब्रेरी बनाई थी। इस मर्मस्पर्शी और पीड़ादायक हादसे ने बशीर बद्र को भीतर तक तोड़ दिया और इसी विस्थापन व दर्द से उस अमर शेर का जन्म हुआ, जो आज भी दुनिया भर में शांति का संदेश देता है।

मेरठ से हुआ विस्थापन, भोपाल ने बाहें फैलाकर अपनाया

इस भीषण नुकसान और खौफ के साए में बशीर बद्र और उनका परिवार दोबारा मेरठ में रहने का साहस नहीं जुटा सका। साल 1988 में उन्होंने वह घर बेच दिया और हमेशा के लिए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल चले गए। भोपाल ने इस महान शायर को पलकों पर बिठाया। यहीं रहकर उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी डॉ. राहत सुल्तान के साथ अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की। इसी भोपाल के घर में उन्हें देश के प्रतिष्ठित ‘यश भारती’ सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया।

प्रारंभिक जीवन और शैक्षणिक सफर

डॉ. बशीर बद्र के जीवन के शुरुआती सफर की बात करें तो उनका जन्म 1935 में कानपुर (उत्तर प्रदेश) में हलीम इंटर कॉलेज के पास हुआ था, जबकि उनका पैतृक निवास उत्तर प्रदेश के मौजूदा आंबेडकर नगर जिले का बुकियां गांव है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कानपुर के हलीम मुस्लिम कॉलेज से तीसरी कक्षा तक पूरी की, जिसके बाद उनके पिता का तबादला इटावा हो जाने के कारण उन्होंने मोहम्मद सिद्दीक़ इस्लामिया कॉलेज से अपना हाई स्कूल पास किया। बशीर बद्र की साहित्यिक प्रतिभा बचपन में ही उभर आई थी; जब वे महज सातवीं कक्षा में थे, तब उनकी एक ग़ज़ल प्रसिद्ध आलोचक नियाज़ फ़तेहपुरी की पत्रिका ‘निगार’ में प्रकाशित हुई थी। इस प्रकाशन से उन्हें इटावा के साहित्यिक जगत में जबरदस्त पहचान मिली और 20 वर्ष की उम्र पार करते-करते उनकी ग़ज़लें भारत और पाकिस्तान की प्रमुख पत्रिकाओं की मस्ट-हेड सुर्खियां बनने लगी थीं। बाद में उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) का रुख किया, जहां से उन्होंने बीए, एमए और फिर प्रसिद्ध शोध निर्देशक प्रोफेसर आले अहमद सुरूर के मार्गदर्शन में “स्वतंत्रता के बाद की उर्दू ग़ज़ल का आलोचनात्मक अध्ययन” विषय पर अपनी पीएचडी की डिग्री हासिल की।

शायरी के लिए छोड़ दी थी पुलिस की नौकरी

बहुत कम लोग जानते हैं कि बशीर बद्र के पिता सैयद नज़ीर अहमद ब्रिटिश इंडिया पुलिस में असिस्टेंट अकाउंटेंट थे। पिता की बीमारी के बाद बशीर बद्र को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में पुलिस विभाग में नौकरी मिली थी, जिसके बाद उनकी पोस्टिंग इलाहाबाद (प्रयागराज) और सीतापुर जैसे जिलों में रही। उन्होंने महज 85 रुपये महीने की सैलरी पर पुलिस में काम किया, लेकिन शायरी के प्रति अगाध प्रेम के चलते साल 1967 में उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वे एएमयू में एडहॉक टीचर रहे और स्कॉलरशिप व मुशायरों की कमाई के दम पर अपना परिवार पालते रहे।

निजी जीवन के उतार-चढ़ाव: पहली पत्नी को नहीं दे सके थे अंतिम विदा

अलीगढ़ में रहने के दौरान बशीर बद्र मशहूर गीतकार मज़रूह सुल्तानपुरी के बेहद करीब रहे और हर शाम उनके साथ अदबी महफ़िलें जमती थीं। बशीर बद्र ने अपने जीवन में दो शादियां कीं। उनकी पहली पत्नी का नाम क़मर जहाँ था, जिनसे उनके तीन बच्चे हुए। मई 1984 में जब बशीर बद्र एक मुशायरे के सिलसिले में पाकिस्तान गए हुए थे, तभी भारत में उनकी पत्नी का आकस्मिक निधन हो गया। उस दौर में यात्रा और संचार के सीमित साधनों के कारण वे दो दिन बाद भारत लौट पाए, जिसके चलते उनकी अनुपस्थिति में ही नाते-रिश्तेदारों ने उनकी पहली पत्नी का अंतिम संस्कार किया था। बाद में वर्ष 1986 में उन्होंने भोपाल की डॉ. राहत सुल्तान से निकाह किया।

आज भले ही बशीर बद्र शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उर्दू शायरी को आम आदमी के सुख-दुख, प्यार और वियोग की भाषा बनाने वाले इस महान शायर की यादें और उनकी ग़ज़लें “उजाले अपनी यादों के…” बनकर हमेशा अदब की दुनिया को रोशन करती रहेंगी।

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