
उदयपुर जिला क्रिकेट संघ का चुनाव 28 सितंबर को होना है, लेकिन चुनाव से ज़्यादा सुर्खियां निर्विरोध अध्यक्ष चुने की जाने की है। पूर्व राजपरिवार के सदस्य लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ का नामांकन दर्ज हो चुका है और तीसरी बार उनका अध्यक्ष बनना लगभग तय माना जा रहा है। सवाल यह है कि क्या क्रिकेट संघ का चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है या फिर सत्ता की पहले से लिखी पटकथा?
लक्ष्यराज सिंह इससे पहले भी दो बार अध्यक्ष रह चुके हैं। अब तीसरी पारी खेलने जा रहे हैं और दिलचस्प यह है कि मैदान पर मुकाबला नाममात्र का ही दिख रहा है। यह परंपरा केवल उदयपुर क्रिकेट तक सीमित नहीं है—कई खेल संघों में चुनाव का मतलब ही है “कौन निर्विरोध ताज पहनेगा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि जब मुकाबला ही नहीं, तो क्या वाकई यह चुनाव है या फिर रस्मअदायगी? जिला क्रिकेट संघ चुनाव: सत्ता की बाज़ी, क्रिकेट कहीं गुम तो नहीं?
उदयपुर जिला क्रिकेट संघ का चुनाव 28 सितंबर को होना है, लेकिन चुनाव से ज़्यादा सुर्खियाँ बटोर रहे हैं “निर्विरोध अध्यक्ष” बनने की संभावनाएँ। पूर्व राजपरिवार के सदस्य लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ का नामांकन दर्ज हो चुका है और तीसरी बार उनका अध्यक्ष बनना लगभग तय माना जा रहा है। सवाल यह है कि क्या क्रिकेट संघ का चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है या फिर सत्ता की पहले से लिखी पटकथा?
बीसीसीआई क्रिकेट अंपायर प्रो.अजात शत्रु सिंह शिवरती ने बताया कि लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ उदयपुर जिला क्रिकेट संघ के तीसरी बार अध्यक्ष होंगे, इस बार उनके निर्विरोध होने कि प्रबल संभावना है। लक्ष्यराज पूर्व में भी उदयपुर जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष व राजस्थान क्रिकेट संघ के पूर्व अध्यक्ष डॉ सी. पी. जोशी जी द्वारा उन्हें विशेष आमंत्रित सदस्य के पद पर सुशोभित कर चुके है.
निर्विरोध अध्यक्ष बनने की परंपरा
लक्ष्यराज सिंह इससे पहले भी दो बार अध्यक्ष रह चुके हैं। अब तीसरी पारी खेलने जा रहे हैं और दिलचस्प यह है कि मैदान पर मुकाबला नाममात्र का ही दिख रहा है। यह परंपरा केवल उदयपुर क्रिकेट तक सीमित नहीं है—कई खेल संघों में चुनाव का मतलब ही है “कौन निर्विरोध ताज पहनाया जाएगा।” ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि जब मुकाबला ही नहीं, तो क्या वाकई यह चुनाव है या फिर रस्मअदायगी?
गुटबाजी और पावर गेम
संघ के भीतर गुटबाजी अपने चरम पर बताई जा रही है। महेन्द्र शर्मा गुट और विरोधी खेमे लगातार बैठकें कर रहे हैं, लेकिन तस्वीर साफ़ है कि मेवाड़ परिवार का वर्चस्व अब भी बरकरार है। विरोध करने वाले भी जानते हैं कि ताक़तवर नाम के आगे मैदान खाली करना ही बेहतर है।
क्रिकेट के नाम पर कुर्सी की राजनीति
यह भी सोचने वाली बात है कि जब जिला क्रिकेट संघ के चुनाव में ज़्यादातर बहस “कौन बनेगा अध्यक्ष, किसका होगा वर्चस्व” पर अटक जाती है, तब असली मुद्दे—खिलाड़ियों का भविष्य, ग्राउंड की स्थिति, कोचिंग सुविधाएं, चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता—सब किनारे लग जाते हैं। खिलाड़ी और क्रिकेट प्रेमी यह सवाल पूछने को मजबूर हैं कि आखिर क्रिकेट संघ में क्रिकेट की चर्चा कब होगी?
वोटिंग, नामांकन और औपचारिकताएं
चुनाव अधिकारी भले ही सुबह 10 से शाम 6 तक नामांकन, जांच, नाम वापसी और मतदान जैसी औपचारिकताओं का ब्यौरा गिना रहे हों, लेकिन भीतरखाने सब जानते हैं कि यह खेल पहले ही तय हो चुका है। 38 क्लबों के प्रतिनिधियों के वोट से भले ही अध्यक्ष चुनने का ढोंग हो, पर नतीजा सबको पता है। ऐसे में यह प्रक्रिया सिर्फ़ एक नाटक बनकर रह जाती है—जहाँ स्क्रिप्ट पहले लिखी जाती है और मंचन बाद में होता है।
पदों की खींचतान
अध्यक्ष पद भले ही “सुरक्षित” दिख रहा हो, लेकिन बाकी 21 पदों पर घमासान की संभावना जताई जा रही है। उपाध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष से लेकर पीआरओ तक हर जगह समीकरण बदले जा सकते हैं। यहां असली लड़ाई है “किस गुट को कितना हिस्सा मिलेगा।” लेकिन यह हिस्सा खिलाड़ियों की बेहतरी के लिए नहीं, बल्कि कुर्सियों की ताक़त और आगे की राजनीति के लिए है।
कुल मिलाकर, जिला क्रिकेट संघ का यह चुनाव क्रिकेट से ज़्यादा पावर गेम की कहानी है। जब भी चुनावी अखाड़ा सजता है, नाम और चेहरे वही होते हैं, बस कुर्सियों का फेरबदल हो जाता है। ऐसे में उदयपुर क्रिकेट प्रेमियों का यह सवाल बिल्कुल जायज़ है—“क्या यह चुनाव क्रिकेट के लिए है या क्रिकेट सिर्फ़ चुनाव की ढाल है?”
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