एक ही दिन में 10 महिलाओं की मौत, क्या आज महिलाओं के लिए अच्छा दिन नहीं था?

 

जयपुर। देश के अलग–अलग हिस्सों से आई सड़क हादसों की खबरों ने इस सवाल को और गहरा कर दिया। एक ही दिन में तीन राज्यों में हुए सड़क हादसों में 10 महिलाओं की दर्दनाक मौत हो गई। ये सिर्फ हादसे नहीं, बल्कि देश में सड़क सुरक्षा और महिलाओं की जान पर मंडराते खतरे की गंभीर तस्वीर हैं।

सबसे भयावह हादसा राजस्थान के जयपुर–बीकानेर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सामने आया।
सीकर जिले के फतेहपुर थाना क्षेत्र के हरसावा गांव के पास बुधवार शाम करीब चार बजे एक अर्टिगा कार की सामने से आ रहे ट्रक से जोरदार टक्कर हो गई। इस हादसे में एक ही परिवार की छह महिलाओं की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। सभी पीड़ित लक्ष्मणगढ़ में एक अंतिम संस्कार में शामिल होकर लौट रहे थे। टक्कर इतनी भीषण थी कि कार पूरी तरह चकनाचूर हो गई और शवों को बाहर निकालने में ग्रामीणों और पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी।

इसी दिन महाराष्ट्र के पुणे में भी एक दर्दनाक सड़क हादसे ने सभी को झकझोर दिया। पिंपरी–चिंचवड़ के कालेवाड़ी इलाके में तेज रफ्तार ट्रक की टक्कर से दो सगी बहनों—ऋतुजा शिंदे (24) और नेहा शिंदे (20) की मौके पर ही मौत हो गई। दोनों बहनें बाइक से जा रही थीं। इस हादसे के बाद पूरे इलाके में शोक का माहौल है।

वहीं उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग में राम मंदिर–चाकबोरा मोटर मार्ग पर एक ऑल्टो कार 150 मीटर गहरी खाई में गिर गई। इस दुर्घटना में हीरा देवी और उमा देवी की घटनास्थल पर ही मौत हो गई, जबकि चालक गंभीर रूप से घायल हो गया। पुलिस और हाईवे पेट्रोलिंग टीम ने रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया।

आंकड़े जो डराते हैं

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में सड़क हादसे अब एक राष्ट्रीय संकट बन चुके हैं।
हर साल देश में करीब 4.5 से 5 लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें 1.7 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है। इनमें महिलाओं की संख्या भी बेहद चिंताजनक है।
औसतन हर साल करीब 20 से 21 हजार महिलाएं सड़क हादसों में जान गंवाती हैं, यानी हर दिन लगभग 55–60 महिलाएं सड़कों पर मौत का शिकार होती हैं।

सवाल जो अनुत्तरित हैं

एक ही दिन में देश के तीन अलग–अलग हिस्सों में महिलाओं की मौतें यह सवाल खड़ा करती हैं कि
क्या तेज रफ्तार, लापरवाही और कमजोर सड़क सुरक्षा व्यवस्था महिलाओं के लिए और ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है?
आखिर कब तक ऐसे दिन आते रहेंगे, जब खबरों की सुर्खियां महिलाओं की मौत से भरी होंगी?

ये हादसे सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों का दर्द हैं, जिनकी दुनिया एक पल में उजड़ गई।

 

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