राजस्थान में भ्रष्टाचार पर मुख्यमंत्री का वज्रप्रहार : ढाई साल में IAS समेत 103 अफसर सस्पेंड, 6 बर्खास्त, 11 की आजीवन पेंशन रोकी

जयपुर। राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार ने प्रदेश में भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी और संवेदनशील सुशासन सुनिश्चित करने के लिए अब तक का सबसे कड़ा रुख अख्तियार किया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर चलते हुए प्रशासनिक अमले में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही पर चौतरफा और ऐतिहासिक प्रहार किया है।

सरकार के ढाई साल के कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और पद के दुरुपयोग के मामलों में एक आईएएस (IAS) अधिकारी सहित 103 अफसरों को निलंबित (Suspend) किया जा चुका है। इसके साथ ही, सख्त संदेश देते हुए 6 अधिकारियों को नौकरी से बर्खास्त और 11 दागी अफसरों की आजीवन पेंशन पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। मुख्यमंत्री ने रिश्वत, ट्रैप, पद का दुरुपयोग और आय से अधिक संपत्ति के 108 मामलों में अभियोजन स्वीकृति जारी की है, जबकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17-ए के तहत 37 अन्य प्रकरणों में भी कठोर कार्रवाई की है।

कार्रवाई के आंकड़ों पर नजर डालें तो ट्रैप, पद के दुरुपयोग और आय से अधिक संपत्ति के मामलों में एक आईएएस सहित कुल 103 अधिकारियों को सस्पेंड किया गया है। वहीं न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होने के बाद 6 अफसरों को सेवा से पूर्ण बर्खास्त कर दिया गया है।

गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के चलते 11 अधिकारियों की आजीवन शत-प्रतिशत पेंशन पर रोक लगाई गई है। इसके अलावा, एसीबी को कोर्ट में केस चलाने की हरी झंडी देते हुए 108 मामलों में अभियोजन स्वीकृति दी गई है और लोक सेवकों के खिलाफ जांच को रफ्तार देने के लिए धारा 17-ए के तहत 37 प्रकरणों में कठोर कार्रवाई अमल में लाई गई है।

मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया है कि जो भी अधिकारी अदालत में दोषी पाया जाएगा, उसे सेवा में रहने का कोई अधिकार नहीं है। इसी नीति के तहत पीडब्ल्यूडी के तत्कालीन विकास अधिकारी (सुवाणा, भीलवाड़ा) भरत प्रकाश मेघवाल, तत्कालीन कृषि उप निदेशक (झुंझुनूं) राजेश कुमार नैनावत, तत्कालीन सहायक आयुक्त भरतपुर (वित्त कर) महावीर सिंह आसीवाल और तीन चिकित्सा अधिकारियों—डॉ. राम मोहन सिंह चौहान (सीएचसी बिछीवाड़ा, डूंगरपुर), डॉ. मुरलीधर शर्मा (सीएचसी Ramgarh पचवारा, दौसा) व डॉ. मनोहर लाल (सीएचसी रामगढ़, अलवर) को सेवा से बर्खास्त किया गया है। साथ ही, हरिसिंह मीना (तत्कालीन एपीपी, कोटा) को भी एसीबी कोर्ट द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद तुरंत नौकरी से हटा दिया गया है।

सरकार ने उन सेवानिवृत्त या वरिष्ठ अधिकारियों पर भी शिकंजा कसा है जो भ्रष्टाचार में लिप्त थे, जिसके तहत 11 अधिकारियों की शत-प्रतिशत पेंशन हमेशा के लिए रोक दी गई है। इनमें आरएएस अधिकारी बनवारी लाल मीणा (तत्कालीन उप सचिव, यूआईटी अलवर) व देवेन्द्र सिंह ढिल्लो (तत्कालीन उप सचिव, यूआईटी अलवर), आरपीएस अधिकारी महेन्द्र सिंह (तत्कालीन वृत्ताधिकारी, सवाई माधोपुर) और पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर्स नृसिंह रेबारी (सहायक अभियंता, प्रतापगढ़) व सुरेश माथुर (अधिशाषी अभियंता, जैसलमेर) शामिल हैं।

इनके अलावा तत्कालीन विकास अधिकारी (कपासन) मनोहर लाल सिसोदिया, तत्कालीन कनिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद कोठारी (भीलवाड़ा), डॉ. कल्पना श्रीवास्तव (चित्तौडगढ़), डॉ. लक्ष्मण दत्त शर्मा (टोंक), डॉ. अविनाश कुमार शर्मा (बांसवाड़ा) और तत्कालीन अधिशाषी अभियंता (आईजीएनपी मोहनगढ़, जैसलमेर) देशराज नूनिया की भी आजीवन पेंशन रोकी गई है, जबकि डॉ. विलास राव गुल्हाने (झालावाड़) को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई है।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने हाल ही में पीएचईडी (PHED) विभाग में जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाले भ्रष्ट अधिकारियों पर भी बड़ा एक्शन लिया है। अलवर प्रयोगशाला के वरिष्ठ रसायनज्ञ प्रदीप कुमार हजरती ने पेयजल के नमूनों की गुणवत्ता जांच में फर्जी रिपोर्ट तैयार की थी, जिसे अक्षम्य अपराध मानते हुए मुख्यमंत्री ने उन्हें तत्काल प्रभाव से सेवा से बाहर कर दिया। इसके अलावा, भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित कार्रवाई करते हुए 108 गंभीर मामलों में अभियोजन स्वीकृति दी गई है, जिससे तत्कालीन एसडीएम (डीग) देवी सिंह, तत्कालीन बीसीएमओ (लालसोट) डॉ. पवन कुमार जैन और पीएचईडी के आला अधिकारियों—मायालाल सैनी (एक्सईएन, अलवर), राकेश चौहान (एईएन, अलवर), राकेश सिंह (एईएन, नीमराना), प्रदीप कुमार (जेईएन), विशाल सक्सेना (एक्सईएन, शाहपुरा) व महेन्द्र प्रकाश सोनी (एसीई, अजमेर) को अब सीधे अदालती कटघरे में खड़ा होना होगा।

मुख्यमंत्री ने कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि जो भी अधिकारी जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका डालेगा, उसकी न तो नौकरी सुरक्षित रहेगी, न पेंशन और न ही वह कानून के फंदे से बच पाएगा।

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