
उदयपुर।
राजस्थान की स्थानीय राजनीति में सहकारिता (Cooperative) चुनावों का महत्व किसी विधानसभा या लोकसभा चुनाव से कम नहीं होता, क्योंकि ये ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जमीनी पकड़ की धुरी होते हैं। उदयपुर जिला सहकारी भूमि विकास बैंक के हालिया चुनाव इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जहां अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद की नामांकन प्रक्रिया महज एक प्रशासनिक कार्य न रहकर कांग्रेस और भाजपा के बीच एक हाई-वोल्टेज सियासी जंग में तब्दील हो गई।
इस पूरे घटनाक्रम, इसके पीछे के तकनीकी दांव-पेंच और इसके राजनीतिक निहितार्थों का विस्तृत विश्लेषण इस प्रकार है:
इस हंगामे की पृष्ठभूमि चार दिन पहले हुए संचालक मंडल (Board of Directors) के चुनावों से तैयार हो चुकी थी।
बैंक के सुचारू संचालन के लिए कुल 12 सदस्यों का संचालक मंडल चुना जाना था, जिसमें से 3 सदस्य पहले ही निर्विरोध निर्वाचित हो चुके थे।
शेष 9 सीटों पर सोमवार को हुए मतदान में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों ने अधिकांश सीटों पर कब्जा जमाकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया।
इस बहुमत के बाद यह लगभग तय माना जा रहा था कि कांग्रेस समर्थित वरिष्ठ नेता और पूर्व बैंक अध्यक्ष मथुरेश नागदा (अध्यक्ष पद) तथा करण सिंह (उपाध्यक्ष पद) आसानी से अपनी जीत दर्ज कर लेंगे।
जब कांग्रेस अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिख रही थी, ठीक उसी समय भाजपा ने ऐन मौके पर एक गंभीर तकनीकी और कानूनी अड़ंगा लगा दिया।
भाजपा की आपत्ति : दोपहर करीब 12:10 बजे भाजपा के रणनीतिकारों (ललित सिंह सिसोदिया, सन्नी पोखरना, नीरज सामर) ने निर्वाचन अधिकारी विनोद कुमार कोठारी के समक्ष एक लिखित आपत्ति दर्ज कराई।
तकनीकी पहलू : भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस की ओर से अध्यक्ष व उपाध्यक्ष पद के दोनों दावेदार नियमों के तहत इस पद के पात्र नहीं हैं, क्योंकि वे बैंक के ‘ऋणधारक’ (ऋणी) नहीं हैं। सहकारी नियमों के अनुसार, भूमि विकास बैंक के शीर्ष पदों पर बैठने के लिए कतिपय शर्तों और ऋण पात्रता का होना अनिवार्य होता है।
अदालती संदर्भ : इसके साथ ही भाजपा ने पूर्व में सेशन कोर्ट के समक्ष दी गई एक तकनीकी आपत्ति को भी इस मामले से जोड़कर अपने पक्ष को और मजबूत करने का प्रयास किया।
इस तकनीकी आपत्ति की खबर फैलते ही दोनों दलों के बीच का तनाव कलेक्ट्रेट और बैंक परिसर के बाहर साफ देखा गया।
अंदरूनी खींचतान : निर्वाचन अधिकारी के चैंबर के भीतर ही दोनों पक्षों के नेताओं (कांग्रेस की ओर से दिनेश श्रीमाली, गौरव प्रताप सिंह आदि) के बीच तीखी बहस और हंगामा शुरू हो गया।
बाहरी शक्ति प्रदर्शन : बैंक परिसर के बाहर कांग्रेस के दिग्गज नेताओं—पूर्व देहात जिलाध्यक्ष लालसिंह झाला, पूर्व मंत्री डॉ. मांगीलाल गरासिया और विवेक कटारा ने अपनी टीम के साथ मोर्चा संभाल रखा था, ताकि किसी भी विपरीत प्रशासनिक निर्णय की स्थिति में तुरंत दबाव बनाया जा सके। माहौल की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन को मौके पर भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा।
इस पूरे राजनैतिक गतिरोध के बीच निर्वाचन अधिकारी विनोद कुमार कोठारी ने एक परिपक्व और निष्पक्ष प्रशासनिक रुख अपनाया। उन्होंने दोनों पक्षों को शांत करते हुए भाजपा की आपत्ति को लिखित रूप में स्वीकार किया।
वर्तमान में, निर्वाचन अधिकारी ने दोनों कांग्रेस प्रत्याशियों के नामांकन पत्रों, बैंक रिकॉर्ड और कानूनी दस्तावेजों की स्क्रूटनी (गहन जांच) शुरू कर दी है।
जांच की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए राजनेताओं को चैंबर से बाहर कर दिया गया है।
यह घटनाक्रम दर्शाता है कि सहकारिता के चुनावों में केवल ‘संख्या बल’ (बहुमत) ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि नियमों के ‘तकनीकी दांव-पेंच’ कभी भी बाजी पलट सकते हैं।
कांग्रेस के लिए चुनौती: यदि जांच में मथुरेश नागदा और करण सिंह के दस्तावेज नियमों के विपरीत पाए जाते हैं, तो स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद कांग्रेस के हाथ से यह महत्वपूर्ण बैंक निकल सकता है।
भाजपा की रणनीति : भाजपा ने संख्या बल में पिछड़ने के बाद कानूनी और प्रक्रियात्मक खामियों को हथियार बनाकर कांग्रेस की बनी-बनाई बढ़त को कड़े संशय में डाल दिया है।
अब सारा दारोमदार निर्वाचन अधिकारी की विधिक जांच पर टिका है, जिसका फैसला उदयपुर की सहकारी राजनीति की आगामी दिशा तय करेगा।
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