हल्दीघाटी–रक्त तलाई पर हाईकोर्ट का सख़्त रुख, स्वतः संज्ञान लेकर PIL; निर्माण पर रोक, तत्काल सफ़ाई के आदेश…नेताओं की खामोशी पर सवाल

इमेज : एआई

जोधपुर। महाराणा प्रताप की वीरता और स्वाभिमान के प्रतीक हल्दीघाटी दर्रा और रक्त तलाई की बदहाली पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने कड़ा हस्तक्षेप करते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। द टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट “Highway to Haldighati: Where Chetak’s Leap Meets Truck’s Roar” के आधार पर अदालत ने इसे जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज कर किसी भी नए निर्माण व विस्तार कार्य पर तत्काल रोक, 15 दिन में विशेष सफ़ाई अभियान और अतिक्रमण–प्रदूषण पर सख़्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका दर्ज किया जाना, दरअसल राजनीतिक और प्रशासनिक निष्क्रियता पर न्यायिक टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।

डॉ. न्यायमूर्ति पुष्पेन्द्र सिंह भाटी और संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने कहा कि इन स्थलों की उपेक्षा, अतिक्रमण और पर्यावरणीय क्षरण भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए गंभीर खतरा है।

रणक्षेत्र पर हाईवे, इतिहास पर बुलडोज़र

अदालत ने समाचार रिपोर्ट के हवाले से कहा कि 1576 के ऐतिहासिक युद्ध का साक्षी रहा हल्दीघाटी दर्रा, जो कभी इतना संकरा था कि दो घोड़े ही साथ निकल सकते थे, अब 40 मीटर चौड़े दो-लेन हाईवे में बदल चुका है। वर्ष 2019 में हुए सड़क विस्तार कार्य के दौरान 200 से अधिक पेड़ों की कटाई, पहाड़ियों को समतल करना और संभावित पुरातात्विक अवशेषों का डामर के नीचे दब जाना गंभीर चिंता का विषय है।

कोर्ट ने माना कि वाहनों से निकलने वाला धुआँ, कार्बन मोनोऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसें लौह ऑक्साइड युक्त पीली मिट्टी को नुकसान पहुँचा रही हैं, जिससे कटाव और ढलान के ढहने का जोखिम बढ़ गया है।

कचरे और अतिक्रमण की चपेट में रक्त तलाई

खंडपीठ ने रक्त तलाई की स्थिति को भी अत्यंत दयनीय बताया। जहां कभी युद्ध अपने चरम पर पहुँचा था, वहां आज झाड़ियां, टूटी बोतलें, सूखा तालाब और सीवेज का बहाव दिखाई देता है। तनवर शहीदों की छतरी और महाराणा प्रताप के विश्वस्त सेनापति हकीम ख़ान सूर की समाधि उपेक्षा का शिकार हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, तालाब की भूमि पर सरकारी स्कूल और अस्पताल जैसे निर्माण भी खड़े हैं, जबकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की ओर से न तो समुचित घेराबंदी है और न ही देखरेख की व्यवस्था।

संवैधानिक और क़ानूनी उल्लंघन

उच्च न्यायालय ने प्रारंभिक तौर पर माना कि यह स्थिति—संविधान के अनुच्छेद 49 (राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की सुरक्षा), अनुच्छेद 51A(g) (सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का नागरिक कर्तव्य), अनुच्छेद 21 (स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण का अधिकार) का उल्लंघन है।
साथ ही यह प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वायु व जल प्रदूषण नियंत्रण कानूनों और वन संरक्षण अधिनियम के भी विरुद्ध है।

केंद्र–राज्य सहित 16 विभागों को नोटिस

उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार, राजस्थान सरकार, ASI, NHAI, पर्यटन, वन व पर्यावरण विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और ज़िला प्रशासन सहित 16 विभागों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। सभी को संरक्षण के लिए उठाए गए कदमों, अतिक्रमण हटाने, प्रदूषण नियंत्रण और महाराणा प्रताप टूरिस्ट सर्किट की प्रगति पर हलफ़नामा देने को कहा गया है।

तत्काल अंतरिम आदेश

कोर्ट ने अंतरिम आदेशों में कहा है कि—न्यायालय की अनुमति के बिना किसी भी नए निर्माण या विस्तार कार्य पर तत्काल रोक लगेगी, 15 दिनों के भीतर विशेष सफ़ाई अभियान चलाया जाएगा, ऐतिहासिक ढलानों पर वाहन पार्किंग पर अस्थायी प्रतिबंध और कचरा फैलाने पर जुर्माना लगाया जाएगा, रक्त तलाई में सीवेज निकासी और जलभराव की समस्या 30 दिनों में दूर की जाएगी, स्थलों की निगरानी के लिए केयरटेकर नियुक्त किए जाएंगे।

अगली सुनवाई 28 जनवरी को

अदालत ने तीन अधिवक्ताओं लक्ष्य सिंह उदावत, तान्या तूली व उदयपुर की रहने वाली यशवी खंडेलवाल को एमिकस क्यूरी नियुक्त करते हुए मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी 2026 को तय की है। ये तीनों अधिवक्त बतौर याचिकाकर्ता पैरवी करेंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह विरासत शत्रुओं की तलवार से नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता से नष्ट हो जाएगी।

 

हाईकोर्ट के हस्तक्षेप ने खड़े किए असहज प्रश्न

राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका दर्ज किया जाना, दरअसल राजनीतिक और प्रशासनिक निष्क्रियता पर न्यायिक टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। अदालत का यह हस्तक्षेप उन नेताओं और विभागों के लिए असहज सवाल खड़ा करता है, जिन्होंने वर्षों तक महाराणा प्रताप को प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया, लेकिन उनकी विरासत को ज़मीन पर बचाने में विफल रहे।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अब यह सिर्फ विरासत का सवाल नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही और नैतिकता की परीक्षा है—क्या प्रताप सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेंगे या उनकी धरती को भी वही सम्मान मिलेगा, जिसकी बातें मंचों से की जाती हैं।

नेताओं की चुप्पी पर सवाल

सवाल यह भी उठ रहा है कि महाराणा प्रताप के नाम पर सियासत करने वाले नेता आखिर इस मुद्दे पर अब तक खामोश क्यों रहे। चुनावी मंचों और जयंती समारोहों में प्रताप के शौर्य का उल्लेख करने वाले जनप्रतिनिधियों ने हल्दीघाटी और रक्त तलाई की दुर्दशा पर कोई ठोस सार्वजनिक हस्तक्षेप नहीं किया। न संसद में सवाल उठे, न विधानसभा में कोई ठोस प्रस्ताव सामने आया।

विशेषज्ञों और स्थानीय संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई जाती, तो न तो रणक्षेत्र पर हाईवे की मार पड़ती और न ही रक्त तलाई अतिक्रमण और सीवेज का डंप बनती।

मेवाड़ कॉम्प्लेक्स योजना काग़ज़ों में सिमटी

इसी तरह मेवाड़ कॉम्प्लेक्स योजना के तहत महाराणा प्रताप से जुड़े जिन ऐतिहासिक स्थलों—हल्दीघाटी, रक्त तलाई, गोगुंदा, चावंड और चित्तौड़—का समग्र विकास प्रस्तावित था, वे अब तक उपेक्षा का शिकार हैं। योजना के नाम पर घोषणाएँ तो होती रहीं, लेकिन ज़मीन पर न संरक्षण दिखा, न आधारभूत सुविधाएँ, न ही पर्यटकों के लिए व्यवस्थित ढांचा।

पर्यटन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह योजना समयबद्ध ढंग से लागू होती, तो ये स्थल न केवल ऐतिहासिक चेतना के केंद्र बनते, बल्कि स्थानीय रोज़गार और सांस्कृतिक पर्यटन को भी मजबूती मिलती।

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