
उदयपुर। 20 फरवरी 2011, महाराणा कुंभा संगीत समारोह का 49वां संस्करण। सुखाड़िया रंगमंच सजीव था और मंच पर मौजूद थे तबले के जादूगर उस्ताद जाकिर हुसैन। उस शाम जब उस्ताद के हाथ तबले पर थिरके, तो संगीत प्रेमियों ने अनोखे संगीत का अनुभव किया—एक झरना बहा, शंख गूंजा और ट्रेन की सीटी सुनाई दी। पूरा सभागार जैसे एक लय में बंध गया, मंत्रमुग्ध हो गया।
“तबले की थाप ने बहाया झरना…”
फोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत, जिन्होंने इस कार्यक्रम को कवर किया था, याद करते हैं कि उस्ताद के तबले से निकलने वाली आवाज़ें किसी चमत्कार से कम नहीं थीं। झरने का बहता संगीत, शंख की पवित्र गूंज और दूर से आती ट्रेन की ध्वनि—ये सब उस्ताद की उंगलियों की करामात थी। यह सिर्फ एक तबला वादन नहीं, बल्कि उस्ताद के संगीत से सजी एक अद्भुत यात्रा थी।

“उस्ताद की शख्सियत और संगीत की महक”
कार्यक्रम के दौरान उस्ताद जाकिर हुसैन ने उदयपुर की तारीफ करते हुए कहा था कि इस शहर का सौंदर्य और लोगों का प्रेम उन्हें बार-बार यहां खींच लाता है। उनकी आवाज़ और अंदाज़ में वो अपनापन था जिसने संगीत के साथ-साथ लोगों के दिलों को भी छू लिया। तबले के बीच-बीच में उनके हल्के-फुल्के चुटकुले और लाजवाब प्रस्तुतियां उस शाम का आकर्षण थीं।
“स्मृतियों में गूंजती थाप”
संगीत प्रेमियों ने देखा कि कैसे उस्ताद के हाथों ने तबले को एक जीवन दे दिया था। तबले की थाप पर जैसे पूरा सभागार सांस ले रहा था। लोगों ने अपनी हथेलियों से ताली की लय पकड़ते हुए उस्ताद की हर धुन पर अपना सिर झुकाया।
आज भी, 49वें महाराणा कुंभा संगीत समारोह का वह ऐतिहासिक क्षण उदयपुर के संगीत प्रेमियों के दिलों में गूंजता है। उस्ताद जाकिर हुसैन का तबला एक कहानी कहता है—संवेदनाओं की, प्रकृति की और संगीत के शाश्वत आनंद की।

सुखाड़िया रंगमंच पर उस दिन बहा झरना और गूंजे शंख की वह थाप हमेशा के लिए अमर हो गई। उस्ताद की कला और उनके सजीव संगीत ने उस शाम को इतिहास बना दिया।
उदयपुर के संगीत प्रेमियों को ऐसे यादगार संगीत समारोहों की सौगात देने में वायएस कोठारी का योगदान अविस्मरणीय है। संगीत के सच्चे संरक्षक और उदयपुर की सांस्कृतिक विरासत के सशक्त स्तंभ, वायएस कोठारी ने इस शहर के लोगों के लिए कई यादगार संगीत की शामें सजाईं।
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