उदयपुर की एप्सटीन फाइल्स—क्या रसूखदारों के दबाव में दफन हो जाएगी हकीकत?

 

उदयपुर। झीलों की नगरी में इन दिनों फिजाओं में होली के गुलाल से ज्यादा एक ‘सियासी बारूद’ की गंध महसूस की जा रही है। सवाल सीधा है, लेकिन जवाब बेहद पेचीदा—क्या उदयपुर की ‘एप्सटीन फाइल’ (उदयपुर फाइल्स, उदयपुर वीडियोकांड जैसे नाम से चर्चित मामला) दब गई है या इसे बहुत करीने से मैनेज कर लिया गया है? सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि प्रेशर कुकर की सीटी बजने ही वाली है, बस इंतजार उस चिंगारी का है जो इस सियासी विस्फोट को अंजाम देगी।

वीडियो की ‘लीक’ और खास लोगों की ‘नींद’

सूत्रों की मानें तो यह सिर्फ कोरी अफवाह नहीं है। विवादित वीडियो उन ‘खास लोगों’ के फोन तक पहुंच चुका है, जिनकी एक हरकत शहर की सियासत में भूचाल ला सकती है। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) में इस फाइल को लेकर हलचल तेज है। उदयपुर से सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधिमंडल लगातार आलाकमान के चक्कर काट रहे हैं। उनका संदेश साफ है : “पार्टी की छवि दांव पर है, अगर कार्रवाई नहीं हुई तो खामियाजा बड़ा होगा।” प्रशासनिक स्तर पर भी सुगबुगाहट बढ़ गई है। भाजपा सूत्रों का दावा है कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अब जांच का जिम्मा एएसपी स्तर के अधिकारी को सौंपा गया है। सवाल यह है कि क्या यह जांच किसी नतीजे पर पहुंचेगी या सिर्फ समय काटने का एक जरिया है?

जिलाध्यक्ष की कुर्सी : किलेदारों और पहरेदारों का संघर्ष
इस फाइल के जिन्न ने उदयपुर भाजपा में ‘गृहयुद्ध’ जैसी स्थिति पैदा कर दी है। नए जिलाध्यक्ष के लिए लॉबिंग इतनी आक्रामक है कि मर्यादाओं की दीवारें ढहती नजर आ रही हैं। पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया और शहर विधायक ताराचंद जैन के दरबारों में हाजिरी लगाने वालों की भीड़ यह बता रही है कि ‘सत्ता के समीकरण’ बदल रहे हैं।

पार्टी अब दो स्पष्ट गुटों में बंट चुकी है:

पुराने किलेदार : जो अपनी ढहती हुई सियासी जमीन को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।

नए पहरेदार : जिनका आरोप है कि मौजूदा नेतृत्व ने उदयपुर में भाजपा की ‘सियासी फसल’ को बर्बाद कर दिया है।

“मौजूदा खेमे ने खाद के नाम पर जहर डाला है, अब इस बंजर जमीन को बचाने के लिए नए नेतृत्व की हल चलाना जरूरी है।” — नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ नेता।

खाद-पानी और दिल्ली का ‘रिमोट कंट्रोल’

दिलचस्प बात यह है कि जो लोग ‘सियासी खेत’ से बाहर होने की कगार पर हैं, वे अब दिल्ली और जयपुर से उस ‘खाद-पानी’ (राजनीतिक संरक्षण) का इंतजाम कर रहे हैं, जिससे उनकी सूखती जड़ें फिर से हरी हो सकें। वे खुद को चारे की तरह कटने से बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं।

तीखा सवाल?

उदयपुर की जनता यह पूछ रही है कि क्या नैतिकता की दुहाई देने वाली पार्टी अपने ही ‘रसूखदार चेहरों’ पर कार्रवाई करने की हिम्मत दिखाएगी? या फिर ‘एप्सटीन फाइल’ के पन्ने रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिए जाएंगे?

कार्रवाई लाजिमी है, वरना जनता की अदालत में इंसाफ का तराजू डगमगा सकता है।

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