
फोटो : कमल कुमावत
उदयपुर। उदयपुर भाजपा में इन दिनों सब कुछ वैसा नहीं है जैसा कैमरों की चमक में दिखाई देता है। भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर सूरजपोल स्थित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर दीपोत्सव तो मनाया गया, लेकिन इस उजाले के पीछे ‘गुटीय राजनीति’ का अंधेरा साफ नजर आ रहा है।
हाल ही में हुई ‘उदयपुर फाइल्स’ की चर्चाओं ने पार्टी के भीतर जिस दरार को जन्म दिया है, उसका असर अब धरातल पर दिखने लगा है।
स्वागत में ‘सैलाब’, उत्सव में ‘सन्नाटा’
सबसे चौंकाने वाली बात कार्यकर्ताओं और बड़े चेहरों की अनुपस्थिति रही। अभी महज 24 घंटे पहले जब पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया उदयपुर पहुंचे थे, तो उनके स्वागत में कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ पड़ा था। कटारिया समर्थक गुट ने जिस तरह शक्ति प्रदर्शन किया, उससे लगा था कि संगठन पूरी तरह एकजुट है।
लेकिन, स्थापना दिवस के आधिकारिक कार्यक्रम में वह जोश नदारद दिखा। जो लोग कटारिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे, उनमें से कई प्रमुख चेहरे आज संगठन के कार्यक्रम से दूरी बनाए दिखे। यह संकेत देता है कि उदयपुर भाजपा स्पष्ट रूप से दो धड़ों में बंट चुकी है—एक जो पुराने दिग्गज के साथ है और दूसरा जो वर्तमान संगठनात्मक ढांचे (जिला अध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ गुट) के साथ खड़ा है।
‘उदयपुर फाइल्स’ का गहराता साया
पार्टी के भीतर ‘उदयपुर फाइल्स’ को लेकर मची खींचतान ने कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित किया है। दीपोत्सव के दौरान भले ही डॉ. मुखर्जी के सिद्धांतों और अंत्योदय की बातें की गईं, लेकिन चर्चा का विषय वह ‘भीतरी जंग’ ही रही जिसने संगठन को दो हिस्सों में काट दिया है। एक धड़ा जहां खुद को ‘मूल विचारधारा’ का रक्षक बता रहा है, वहीं दूसरा धड़ा इसे सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई मान रहा है।
संगठन बनाम व्यक्ति विशेष की निष्ठा
सांसद डॉ. मन्नालाल रावत और जिला अध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ की उपस्थिति में हुए इस कार्यक्रम में ‘विकसित भारत’ का संकल्प तो लिया गया, लेकिन चुनौती ‘विकसित संगठन’ बनाने की है।
दूरी का संदेश : प्रमुख पदाधिकारियों और पार्षदों की गैर-मौजूदगी यह बताती है कि पार्टी में ‘अनुशासन’ पर ‘व्यक्तिगत निष्ठा’ हावी हो रही है।
आगामी कार्यक्रम : अब सबकी नजरें 6 अप्रैल की साइकिल रैली और 7 अप्रैल के स्वच्छता अभियान पर हैं। क्या इन कार्यक्रमों में वह ‘गायब’ हुए कार्यकर्ता वापस लौटेंगे, या फिर यह दूरियां और बढ़ेंगी?
उदयपुर भाजपा के लिए यह स्थापना दिवस केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का समय है। यदि एक दिन पहले राज्यपाल के स्वागत में उमड़ने वाली भीड़ अगले दिन संगठन के दीपोत्सव से गायब हो जाती है, तो यह नेतृत्व के लिए खतरे की घंटी है। ‘उदयपुर फाइल्स’ के बाद पैदा हुई यह खाई अगर जल्द नहीं भरी गई, तो आगामी स्थानीय चुनावों में पार्टी को अपनी ही ‘भीतरी फाइल्स’ से जूझना पड़ सकता है।
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