
वो आवाज़ जो कभी ‘दम मारो दम’ की धुंध में थिरकती थी, कभी ‘इन आंखों की मस्ती’ में डूबकर गज़ल हो जाती थी, आज खामोश हो गई। आशा भोंसले का जाना संगीत के एक ऐसे अध्याय का अंत है, जिसने सात दशकों तक भारतीय मानस को जवान बनाए रखा। 92 वर्ष की आयु में जब मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल से उनके निधन की खबर आई, तो लगा जैसे सुरों के इंद्रधनुष से एक चंचल रंग फीका पड़ गया।
आशा ताई केवल एक गायिका नहीं थीं, वे एक ‘फाइटर’ थीं। एक ऐसी कलाकार, जिसने हमेशा अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की विशाल छाया से बाहर निकलने के लिए संघर्ष किया। उन्होंने खुद एक बार कहा था कि एक ही परिवार में जब कोई बहुत बड़ा नाम हो, तो बाकी लोग अक्सर उस नाम के नीचे दब जाते हैं। लेकिन आशा ने हार नहीं मानी। वे पंजाब, मद्रास या गुजरात से नहीं आई थीं कि सीधे ‘नंबर वन’ मान ली जाएं, वे उसी घर से थीं जहां ‘सुर साम्राज्ञी’ विराजमान थीं। उन्हें हमेशा तराजू पर तोला गया, पर उन्होंने अपनी गायकी में वो ‘लोच’ और ‘अदा’ पैदा की, जिसका कोई सानी नहीं था।
पंचम यानी आर.डी. बर्मन के साथ उनकी ट्यूनिंग एक अलग ही दास्तान है। मज़ाक-मज़ाक में पंचम ने उन्हें सोने का झाड़ू तक तोहफे में दे दिया था क्योंकि आशा को सफाई का जुनून था। संगीत के उस दौर में जब लाइव रिकॉर्डिंग होती थी, तब आंखों ही आंखों में बातें हुआ करती थीं। किशोर दा, रफ़ी साहब और दीदी के साथ उनकी मूक भाषा ही सुरों को सही ठिकाना देती थी। वे दीदी की ‘आड़ी आंख’ की हरकत से समझ जाती थीं कि अब तान शुरू होने वाली है।
गुलज़ार साहब के रूमानी और थोड़े ‘अतरंगी’ बिम्बों पर वे अक्सर चुटकी लेती थीं। जब गुलज़ार लिखते—’चांद को तोड़कर खाओ’ या ‘चांद की मिस्री’, तो आशा हंसकर कहती थीं, “गुलज़ार भाई, आप एक बार चांद का अचार ही डाल लो!” यह उनकी ज़िंदादिली ही थी जिसने उन्हें उम्र के आखिरी पड़ाव तक ३० साल की युवती जैसा महसूस कराया।
वे अक्सर कहती थीं कि वे गाते-गाते ही इस दुनिया से विदा होना चाहती हैं। उनका फलसफा साफ़ था— “तब तक ज़िंदा रहें, जब तक काम कर सकें।” आज वे चली गईं, पर उनकी आवाज़ की वो शरारत, वो दर्द और वो खनक हमारे एकांत के साथी बने रहेंगे।
सिनेमा के पर्दे के पीछे और माइक्रोफोन के सामने की यह सबसे ऊर्जस्वित कहानी आज एक अनंत आलाप में तब्दील हो गई। अलविदा ताई! आपकी कमी कोई ‘झाड़ू’ या ‘मछली’ का किस्सा नहीं, बल्कि संगीत की रूह का खालीपन है।
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