शब्द जो बात बयां नहीं करते…वो तस्वीरें बयां कर देती है…

तस्वीर उस ‘शर्म’ को कैद कर लेती है जिसे शब्द बयां नहीं कर पाते।

जब एक तस्वीर परतों को चीरती है, तो वह सवाल पूछती है?

मुस्कराते हुए चेहरे हमारे दावों पर सबसे तीखा सवाल होते हैं।

तस्वीरें उन लोगों को ‘पहचान’ देती हैं जिन्हें व्यवस्था ने केवल एक ‘संख्या’ (Data) बना दिया है। चाहे वह कतार में खड़ा मजदूर हो या अस्पताल के फर्श पर पड़ा मरीज, तस्वीर हमें यह याद दिलाती है कि इन अव्यवस्थाओं के पीछे हाड़-मांस के इंसान हैं, जिनकी अपनी उम्मीदें और दर्द हैं।

एक तस्वीर जब सवाल पूछती है, तो उसके पास कोई जवाब नहीं होता, लेकिन वह देखने वाले को जवाबदेह जरूर बना देती है। वह हमसे पूछती है कि क्या हम केवल एक ‘दर्शक’ बने रहेंगे या उन चेहरों की आवाज़ बनेंगे जो व्यवस्था की धूल में कहीं खो गए हैं?

 

 

 

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