सिलेंडर की ब्लैक-मार्केटिंग से दो करोड़ की घूस का खेल’: उदयपुर के महाघोटाले का नेक्सस, बिग बुल और हमारी लाचार व्यवस्था

हेलो, नमस्कार! मैं सैयद हबीब आपको दोस्त

आज बात उस कड़वे सच की, जिसे सुनकर शायद आपको हैरानी न हो, लेकिन अंदर तक गुस्सा ज़रूर आएगा। हम और आप अक्सर प्राइम-टाइम की बहसों में पूछते हैं कि इस मुल्क में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी क्यों हैं? कानून के लंबे हाथ आखिरकार रसूखदारों की चौखट तक पहुंचते-पहुंचते कांपने क्यों लगते हैं?

इसका जीता-जागता जवाब तलाशना हो, तो राजस्थान के खूबसूरत शहर उदयपुर चले आइए। जहाँ 272 बेशकीमती भूखंडों के घोटाले में दो करोड़ की रिश्वत लेते पकड़े गए एक ‘दलाल’ की कुंडली जब खुली, तो पूरा सिस्टम बेनकाब हो गया।

नाम है—सज्जन कुमार जैन उर्फ टाटला।

अब ज़रा इस किरदार की टाइमलाइन देखिए। कोई तीस साल पहले यह शख्स गलियों में रसोई गैस सिलेंडरों की ब्लैक मार्केटिंग का मामूली धंधा करता था। आम आदमी की मजबूरी पर मुनाफा कमाने वाला एक छोटा-मोटा जमाखोर। लेकिन हमारे सियासी और प्रशासनिक इकोसिस्टम का कमाल देखिए! वही सिलेंडर ब्लैक करने वाला शख्स धीरे-धीरे नेताओं, ब्यूरोक्रेट्स और ज़मीन के भूमाफियाओं के बीच का सबसे बड़ा ‘क्राइसिस मैनेजर’ और ‘लाइजनर’ बन जाता है।

सूत्र बताते हैं कि सूबे के एक पूर्व मंत्री जो अब इस दुनिया में नहीं है के बहुत करीब रहा है। इसीका नतीजा था कि वो बड़ा लाइजनर बन गया? स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) के एडिशनल एसपी मुकेश कुमार सोनी के नाम पर वही शख्स दो करोड़ रुपये का कैश बैग उठाते हुए रंगे हाथों एसीबी के हत्थे चढ़ गया।

जरा ठहरिए और सोचिए! जो एजेंसी बड़े सिंडिकेट और घोटालों की जांच के लिए बनाई गई थी, उसी के आला अफसर के नाम पर मुकदमों से नाम हटाने और फाइलों को दबाने का सौदा हो रहा था। यह कोई ‘वन-ऑफ’ केस नहीं है, यह एक वेल-ऑयल्ड मशीनरी है। अफ़सरों को अपनी वर्दी पर दाग नहीं लगाना होता, नेताओं को सफेद कुर्ते चमकाने होते हैं, और इस पूरे खेल को ज़मीन पर अंजाम देने के लिए सिस्टम ऐसे ‘सज्जनों’ को खाद-पानी देकर पालता-पोसता है।

अब एसीबी का प्रेस नोट आ गया है, रिमांड का दौर चलेगा और कुछ दिनों तक सोशल मीडिया, चैनल्स और अखबारों में ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टियां दौड़ेंगी। लेकिन आज की सबसे बड़ी हेडलाइन और हमारा ‘बिग क्वेश्चन’ यह है:

क्या कानून के हाथ सिर्फ एक दलाल और एक पुलिस अफसर तक ही सीमित रह जाएंगे? या फिर उस सियासी आका और उन प्रभावशाली चेहरों के गिरेबान तक भी पहुंचेंगे, जिनके साये में सिलेंडर का एक कालाबाजारी करने वाला दो करोड़ की दलाली का बेताज बादशाह बन गया?

जब तक ‘पॉवर कॉरिडोर्स’ में बैठे इन असली संरक्षकों पर चोट नहीं होगी, तब तक यकीन मानिए, किरदार बदलते रहेंगे, लेकिन दलाली का यह खुला खेल बदस्तूर जारी रहेगा। जनता देखती रहेगी, और सिस्टम हंसता रहेगा।

 

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