पांच मिनट का अंधड़ और ‘स्मार्टनेस’ की बत्ती गुल…वाहवाही लूटने में अव्वल, काम में ढाक के तीन पात

उदयपुर। अगर आपको कागजों पर विकास की सुनहरी इबारत और हकीकत में बदहाली का बेजोड़ नमूना देखना हो, तो ‘देशभर के मॉडल’ उदयपुर स्मार्ट सिटी में आपका स्वागत है। विकास के नाम पर यहां की रफ्तार अब ‘नौ दिन में ढाई कोस’ वाली कहावत को भी मात दे रही है। यहां पांच मिनट के अंधड़ के बाद पूरी स्मार्ट सिटी की आधी रात तक बिजली गुल है। बहाल होने के बारे में कोई अधिकृत जानकारी नहीं है। दरअसल यह अंधड़ से पेड़ गिरने और बिजली के तार टूटने की वजह से यह हालात पैदा हुए। स्मार्ट सिटी तो वायरलेस होती है तो फिर यह कैसे हुआ? सच बात यह है कि जब उदयपुर स्मार्ट सिटी नहीं बनी थी और आधा घंटे से ज्यादा अंधड़ होने पर भी बिजली इतनी अधिक गुल नहीं होती थी।

 

नगर निगम कमिश्नर, जिला कलेक्टर और स्थानीय विधायक के पास नए-नए प्रोजेक्ट्स की घोषणा करने, उनका फीता काटने और ‘निरीक्षण’ के नाम पर कैमरे के सामने मुस्कुराने का पूरा वक्त है, लेकिन धरातल की सच्चाई यह है कि हालात आज भी ‘ढाक के तीन पात’ बने हुए हैं।

दावे किए गए थे कि उदयपुर को ‘वायरलेस’ और आधुनिक स्मार्ट सिटी बनाया जा रहा है, जहां मौसम की मार का असर बुनियादी सुविधाओं पर नहीं पड़ेगा। लेकिन दावों की हवा निकलने में सिर्फ पांच मिनट लगे। शनिवार को आए महज पांच मिनट के अंधड़ ने पूरी स्मार्ट सिटी को आधी रात तक अंधेरे के आगोश में धकेल दिया।

बड़ा सवाल : जब स्मार्ट सिटी के तहत अंडरग्राउंड केबलिंग और वायरलेस तकनीक के बड़े-बड़े ढिंढोरे पीटे जा रहे थे, तो पेड़ गिरने और तार टूटने से पूरी बिजली व्यवस्था कैसे चरमरा गई?

हैरानी की बात तो यह है कि जब उदयपुर ‘स्मार्ट सिटी’ की इस कथित रेस में शामिल नहीं था, तब आधे घंटे के भीषण अंधड़ में भी ऐसी लाचारी नहीं दिखती थी। बिजली कब आएगी, इसकी अधिकृत जानकारी देने वाला भी कोई जिम्मेदार अधिकारी नहीं मिला। जनता बिजली दफ्तरों में फोन खनखनाती रही और साहबान अपने घरों में ‘स्मार्ट’ नींद लेते रहे।

इस तथाकथित स्मार्ट सिटी की दूसरी सबसे खौफनाक तस्वीर जनता की सेहत के साथ हो रहा खिलवाड़ है। शहर के कई इलाकों में पेयजल आपूर्ति लाइनों में सीवरेज का गंदा पानी मिक्स होकर घरों तक पहुँच रहा है। इतना ही नहीं, जमीन के भीतर का पानी भी इस कदर दूषित हो चुका है कि नलकूपों (ट्यूबवेल) से भी सीवरेज युक्त पानी आ रहा है।

अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के इसी ‘स्मार्ट’ तालमेल का नतीजा है कि आज शहर का आम नागरिक दूषित पानी पीकर बीमार होने को मजबूर है।

अधिकारियों-विधायक की ‘गहरी नींद’ : नगर निगम कमिश्नर और कलेक्टर साहब आए दिन प्रोजेक्ट्स की फाइलें पलटते हैं, सड़कों पर गाड़ियों का काफिला निकालकर निरीक्षण की रस्म अदायगी करते हैं, लेकिन पानी में सीवरेज की मिलावट उन्हें नजर नहीं आती।

जनप्रतिनिधियों की बेरुखी : चुनाव के वक्त विकास की गंगा बहाने का दावा करने वाले विधायक जी अब जनता के इस दर्द पर पूरी तरह मौन हैं। प्रोजेक्ट्स की वाहवाही लूटने के लिए तो मंच सज जाते हैं, लेकिन जनता की सुध लेने के लिए कोई आगे नहीं आता।

स्वास्थ्य महकमा नदारद : पानी पीकर लोग बीमार हो रहे हैं, अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन इस ‘स्मार्ट सिटी’ प्रोजेक्ट के तहत जनता के इलाज या सुध लेने के लिए कोई स्वास्थ्य अधिकारी या डॉक्टर मौके पर तैनात नहीं है।

उदयपुर की जनता अब खुद को ठगा सा महसूस कर रही है। विकास के भारी-भरकम बजट आखिर जा कहां रहे हैं? कमिश्नर, कलेक्टर और विधायक को अब अपनी ‘फोटो-ऑप’ (तस्वीरें खिंचाने) की राजनीति से बाहर निकलकर जनता को यह जवाब देना होगा कि आखिर इस ‘स्मार्ट नरक’ का जिम्मेदार कौन है?

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