पर्दे के पीछे : 272 भूखंडों का सिंडिकेट और दो करोड़ का हफ्ता

सैयद हबीब, उदयपुर

रामगोपाल वर्मा की कल्ट फ़िल्म ‘सत्या’ का वह क्लासिक सीन याद कीजिए, जहां भाऊ भीखू म्हात्रे से कहता है कि इस धंधे की सबसे बड़ी ख़ासियत यही है—“यहां आना अपनी मर्जी से होता है, लेकिन यहां से जाना किसी के बस में नहीं होता।” अंडरवर्ल्ड की दुनिया का यह अटूट उसूल सिर्फ़ गैंगस्टरों पर ही लागू नहीं होता, बल्कि सियासी और प्रशासनिक गलियारों में चलने वाले ज़मीन के काले सिंडिकेट पर भी अक्षरशः खरा उतरता है।

उदयपुर के बहुचर्चित 272 भूखंड घोटाले और उसके नेपथ्य से निकले ताज़ा दो करोड़ के घूसकांड की पटकथा भी किसी बी-ग्रेड नहीं, बल्कि ए-ग्रेड गैंगस्टर फ़िल्म जैसी है। इस खेल में जब कोई एक बार हाथ काले कर लेता है, तो फिर वापसी का कोई रास्ता नहीं बचता।

अंडरवर्ल्ड में एक और अघोषित नियम चलता है—जब तक माल और मुनाफ़ा बराबर बंटता रहता है, तब तक शहर में ‘अमन-चैन’ बना रहता है। लेकिन जैसे ही किसी एक गिरोह ने दूसरे के हिस्से पर डाका डाला या किसी को किनारे लगाने की कोशिश की, फौरन मुखबिरी शुरू हो जाती है। ठीक फ़िल्म ‘वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई’ के सुल्तान मिर्ज़ा के उस तेवर की तरह, जब वह कहता है कि “रास्ते की परवाह करूँगा तो मंज़िल बुरा मान जाएगी।”

उदयपुर के इस ज़मीनी खेल में भी यही हुआ। यह मामला किसी नैतिक जागरण या इंसाफ़ की लड़ाई के तहत बाहर नहीं आया, बल्कि नगर निगम के भीतर मलाई खाने वालों और हिस्से से महरूम रह जाने वालों के बीच की अंदरूनी रंजिश की देन है। महत्वाकांक्षी किरदारों को जब यह फ़ाइल हाथ लगी, तो उन्होंने सीधे ‘मीडिया ट्रायल’ का दांव खेला, ताकि शहर में अपनी ‘दहशत’ और साख दोनों चमकाई जा सके।

शहर विधायक ताराचंद जैन ने विधानसभा के पटल पर इस मामले को पूरी शिद्दत से उठाकर सुर्खियां तो बटोरीं, मगर फ़िल्म ‘वास्तव’ के रघु की तरह सिस्टम का यथार्थ हमेशा अलग ही चाल चलता है। असली ट्विस्ट तब आया जब भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने एसओजी के एडिशनल एसपी मुकेश कुमार सोनी के नाम पर दलाल सज्जन सिंह जैन उर्फ टाटला को परिवादी की फैक्ट्री से दो करोड़ रुपये का टोकन लेते हुए रंगे हाथों दबोच लिया।

जो एजेंसी मुकदमों की तहकीकात के लिए बनाई गई थी, उसी के अफ़सर पर आरोप लग रहे हैं कि वे मुकदमों में राहत देने, नाम हटाने और गैर-जब्त कागज़ात वापस करने का बाकायदा ‘प्रोटेक्शन मनी’ वसूल रहे थे। फ़िल्म ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ का वह मशहूर डायलॉग यहां मौज़ूं बैठता है—“गन भी मेरी, गोली भी मेरी और फैसला भी मेरा।” जब तफ्तीश करने वाले ही सौदेबाज़ी के तख़्त पर बैठ जाएं, तो फिर इंसाफ़ की उम्मीद सिर्फ़ एक मुगालता बनकर रह जाती है।

लेकिन इस पूरे ड्रामे का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू इस शहर की अवाम का मिज़ाज है। जिस दल के राज में यह पूरा ज़मीनी खेल रचा गया, जनता ने उसी को सातवीं बार प्रचंड बहुमत देकर नगर निगम के तख्त पर बैठा दिया। चुनाव के अखाड़े में जो सियासी सूरमा कल तक एक-दूसरे के ख़िलाफ़ घोटालों के सबूत लहरा रहे थे, वे नतीजे आते ही बंद कमरों में एक-दूसरे के गले में हाथ डालकर मुस्कुराते नज़र आए। यह नज़ारा फ़िल्म ‘कंपनी’ के उस फलसफे की याद दिलाता है—“धंधे में कोई किसी का दोस्त या दुश्मन नहीं होता, सिर्फ़ मुनाफ़ा ही सबका सगा होता है।”

अब जब दो करोड़ के इस सनसनीखेज ट्रैप ने 272 भूखंडों की फ़ाइल को एक बार फिर पुलिसिया डायरी से निकालकर शहर के चौराहे पर ला खड़ा किया है, तो देखना यह है कि इस फ़िल्म का ‘द एंड’ क्या होता है। क्या सिस्टम के असली डॉन कभी सलाखों के पीछे जाएंगे, या फिर कुछ दिनों के शोर-शराबे और मीडिया हेडलाइंस के बाद इस केस को भी हमेशा के लिए ‘कोल्ड स्टोरेज’ में दफ़्न कर दिया जाएगा?

फ़िलहाल तो इतना तय है कि इस सियासी सिंडिकेट के चक्रव्यूह में एक बार जो दाखिल हो गया, उसके लिए बाहर निकलने की कोई खिड़की मौजूद नहीं है।

 

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